हुर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का द्वंद्व: अमेरिका और ईरान दोनों ही दावा कर रहे हैं
पिछले कुछ दिनों में हुर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व तेल परिवहन का एक महत्त्वपूर्ण ग्राफ़िक बिंदु है, दो बड़े शक्ति केंद्रों के बीच एक असामान्य खेल का मैदान बन गया है। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने मंगलवार को इस ट्रीटेड वाटर में नई एस्कॉर्ट योजना की घोषणा की, जबकि तेहरान की राज्य मीडिया ने कहा कि ईरान का इस जलडमरूमध्य पर नियंत्रण अब "और अधिक दृढ़" हो गया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसैनिक पंक्तियों को वार्षिक एस्कॉर्ट मिशन में बढ़ावा देना, एक स्पष्ट संदेश देता है: शिपिंग को बाधित नहीं किया जाएगा, चाहे इराकी‑इरानी मनोविज्ञान कितना भी साहसिक क्यों न हो। लेकिन इरान के सरकारी सूत्रों के अनुसार, वह इस वाटर को "स्वदेशी सुरक्षा" के दायरे में लेकर अपनी ताकत को प्रदर्शित कर रहा है, न कि बस अमेरिकी नौसैनिक कुत्ते को टहलाने के लिए।
ऐसी तकरार का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं है। हुर्मुज के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल गुज़रता है, और भारत, जो अपने तेल की लगभग पाँच-छह प्रतिशत आयात इस जलडमरूमध्य से करता है, इस तनाव के कारण संभावित लागत‑वृद्धि और डिलीवरी देरी का सामना कर रहा है। भारतीय तेल कंपनियों ने पहले से ही वैकल्पिक मार्गों—जैसे कि दक्षिण कॅप्री कोस्ट के आसपास—की संभावित लागत‑गणनाएँ शुरू कर दी हैं, हालांकि ये विकल्प आर्थिक रूप से तोड़‑फोड़ के बराबर हो सकते हैं।
भौगोलिक रूप से देखे तो हुर्मुज का नियंत्रण किसी भी बड़े समुद्री शक्ति के लिए एक सशक्त कूटनीतिक कार्ड है। हालाँकि, अमेरिका की "स्वतंत्र नेविगेशन" की घोषणा और ईरान की "सुरक्षा गारंटी" की दावेदारी के बीच का अंतराल, नीतियों की रचना और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच की दूरी को उजागर करता है। इस तरह की दोहरी कहानी अक्सर कूटनीतिक मंच पर सुनाई देती है: एक तरफ बैनर पर शांति‑रक्षा का नारा, दूसरी ओर अदालत में निरंतर दावेदारी‑चक्र।
स्थिति की व्यंग्यात्मक सच्चाई यह है कि दोनों पक्षों ने "नियंत्रण" शब्द को अपने‑अपने मौखिक शस्त्रागार में नया उपकरण बना लिया है। जबकि अमेरिकी ध्वज‑फ्लैग वाले जहाज़ों के पीछे जहाज़‑आसपास एस्कॉर्ट कारवाँ चलेंगे, ईरानी समुद्री फौज संभवतः अपने‑अपने नीयन‑लाइटेड जलडमरूमध्य में "आगे बढ़ो" संकेत देगा। इस घोस्ट‑करंट की निरन्तरता तब तक बनी रहेगी जब तक अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के कोई बड़े मोड़ नहीं आता, और तब तक भारत जैसे तेल‑निर्भर राष्ट्र अपने जहाज़रानी ऑपरेटरों को "वैकल्पिक मार्ग" की तैयारी में व्यस्त देखेंगे।
Published: May 5, 2026