जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: दुनिया

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

सांस्कृतिक मंच पर राजनीति की छाया: वेनिस बिएनाले में रूस पवेलियन विवाद

जैसे ही वेनिस बिएनाले का द्वार 9 मई को जनता के लिए खुल रहा है, आशा की जगह आलोचनात्मक सवालों ने जगह बना ली है। इस वर्ष के सबसे बड़े समकालीन कला समारोह में रूसी राष्ट्रीय पवेलियन को प्रेस प्रीव्यू के लिए खोलना, यूक्रेन पर जारी आक्रमण के दो साल बाद, एक अनपेक्षित राजनीतिक संदेश बनकर उभरा है। इसके पीछे बिएनाले के अध्यक्ष पिएत्रांजेलो बुट्टाफ़ुको का फैसला है, जो इटली सरकार की स्पष्ट असहमति के बावजूद इस कदम को आगे बढ़ा रहे हैं।

इटली के विदेश मंत्रालय ने पहले ही संकेत दे दिया था कि इस तरह की अनुमति यूरोपीय संघ की नैतिक मानकों का उल्लंघन करेगी, जिससे बिएनाले को लगभग €2 मिलियन की निधि रोक का जोखिम उठाना पड़ सकता है। यह तथ्य दर्शाता है कि सांस्कृतिक संस्थानों के पास अब भी पर्याप्त स्वायत्तता नहीं है; उन्हें राष्ट्रीय राजनयिक दबावों के बीच सापेक्षिक बंधनों से जूझना पड़ता है।

रूस के पवेलियन को सार्वजनिक रूप से बंद कर दिया गया है, और यूक्रेनी अधिकारियों ने इसे "अर्थपूर्ण कदम" कहा है। फिर भी, बिएनाले की जूरी ने अप्रैल में सामूहिक इस्तीफ़ा दे दिया, क्योंकि कई प्रविष्टियों के स्रोत उन देशों के नेताओं से जुड़े थे, जिनके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय वारंट जारी हैं। इस कदम ने न केवल कलात्मक चयन प्रक्रियाओं को धुंधला किया, बल्कि यह भी उजागर किया कि कलाकारों की राष्ट्रीय पहचान अब एक विवादास्पद वस्तु बन गई है।

वेनिस बिएनाले के साथ ही यूरोपीय सांस्कृतिक कैलेंडर के अन्य प्रमुख कार्यक्रम—एवरीजन और कैंस फिल्म फेस्टिवल—भी समान धुंधले परिदृश्य से जूझ रहे हैं। एवरीजन में कई देशों ने अपनी मतदान प्रक्रिया पर राजनीति का रंग देखा, जबकि कैंस में कुछ फ़िल्मों को सरकार की नीतियों के संदर्भ में दबाव का सामना करना पड़ा। समग्र रूप से, कला मंच अब राजनयिक खेल का अखाड़ा बनता दिख रहा है, जहाँ "सौंदर्य" को "सुरक्षा" और "आर्थिक दायित्व" के साथ बराबर किया जा रहा है।

भारतीय पाठकों के लिए यह प्रवृत्ति कहीं न कहीं भारतीय सांस्कृतिक नीति के साथ टकराती है। भारत ने हमेशा अपने सांस्कृतिक महोत्सवों—जैसे दि्रवासी कला महोत्सव, इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय शांति संधि, और क़विता फेस्टिवल—के माध्यम से राजनयिक संतुलन रखने का प्रयास किया है। हालाँकि, भारत-रूस संबंधों की ऐतिहासिक गहराई और रूस-युक्रेन संघर्ष के प्रति भारत की अनपेक्षित निरपेक्षता, भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को समान दुविधा में डाल सकती है। यदि यूरोपीय मंच पर राजनीति की धुन तेज़ी से बजती रही, तो भारतीय कलाकारों और आयोजकों को अपने मंच को "सहयोगी स्वच्छंदता" की पराकाष्ठा बनाये रखने के लिए अधिक सटीक रणनीति अपनानी पड़ेगी।

परिणामस्वरूप, कला और संस्कृति के सार्वजनिक विमर्श पर यह प्रश्न उभरता है: क्या राष्ट्रीय पवेलियन अब मात्र राजनयिक उपकरण बन चुके हैं? बिएनाले के मामलों से स्पष्ट है कि संस्थाओं की नैतिक प्रतिज्ञाएँ और सार्वजनिक निधियों की शर्तें अनिवार्य रूप से राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से अलग नहीं रह पातीं। इस ताने-बाने में, जब तक कलाकारों को "राष्ट्र" के लिबास से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक सांस्कृतिक संवाद का स्वच्छ दीपक धुंधला रह जाएगा।

Published: May 6, 2026