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सूडान ने इथियोपिया‑यूएई को ड्रोन हमलों का दायित्व थोपते हुए राजदूत वापसी की घोषणा

सूडान के राजधानी खार्तूम में हुए दो क्रमिक ड्रोन हमलों के बाद, जो कई सैन्य ठिकानों को क्षतिग्रस्त कर चुके हैं, अब्देल फाताह अल‑बाशिर सरकार ने एड़ीस अबाबा के अपने राजदूत को निकाले जाने का आदेश दिया। यह कदम, जो कूटनीतिक शब्दकोश में ‘वार्निंग’ से अधिक नहीं है, बताता है कि सऊदी‑इथियोपियन‑यूएई की जटिल जाल में पश्चिमी हस्तक्षेप के बाद भी दांव अभी बाकी है।

सूडान ने आधिकारिक रूप से इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को इन ड्रोन के स्रोत के रूप में नामित किया है। दावा है कि इथियोपियाई एंटी‑टेररिटोरियल इकाइयाँ यूएई‑सभीत्रीक ड्रोन सिस्टम—मुख्यतः टर्की‑निर्मित बायराक्टर TB2—का उपयोग करके इन हमलों को अंजाम देते हैं। एड़ीस सरकार ने तत्काल इन आरोपों को नकारते हुए कहा, “हमारी सीमाओं से बाहर के किसी भी सैन्य ऑपरेशन में हमें कोई भागीदारी नहीं है।”

यूएई की भूमिका पर भी समान संदेह है। पूर्व में, यूएई ने सदर्न अफ्रीका में अपनी ‘ड्रोन शक्ति’ को कई गैर‑राज्य अंशधारकों को प्रदान किया था, अक्सर स्थानीय युद्धरत गुटों को तरजीह देते हुए, जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सुदूर पूर्वी अफ्रीका में सैन्य संतुलन बिगड़ा। इस बार, सूडान के परराष्ट्र मंत्रालय ने कहा कि “आधारभूत जाँच के अभाव में, हमारे पास केवल वही सबूत हैं जो हमारे अंतरिक्षीय निगरानी एंजिनों ने दिखाए हैं”—एक वाक्य जो तकनीकी जाँच के बगैर “साक्ष्य” को ही साक्ष्य मानने की प्रवृत्ति को उजागर करता है।

ड्रोन हमले उसी समय आए हैं, जब 2025 में अस्थायी रूप से स्थापित हुआ शांति‑समझौता, एक दशक‑भारी गृहयुद्ध के बाद, धुंधली गति से फिर से टूटने की कगार पर था। इस समझौते को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं—जैसे संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ और यूरोपीय संघ—ने “स्थर स्थिरता में वृद्धिकर” कहा था, लेकिन उनके शब्द असल में एक खुले‑आम “देखा-देखी” समाधान पर ही टिके थे। अब यह स्पष्ट हो रहा है कि “स्थर” अभी भी घिसी‑पिटी रूढ़ियों में फँसा है, जहाँ दुश्मनी के छोटे‑छोटे संकेतों को “विवादास्पद” कहा जाता है, लेकिन वास्तविक पीड़ित—सामान्य नागरिक—की पीड़ा को अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है।

क्षेत्रीय कूटनीति में इस नई मुसीबत का असर विशेष रूप से भारत के लिए भी मायने रखता है। भारत की सूडान में तेल‑खेल, कृषि‑प्रोजेक्ट और अचल‑सम्पत्ति निवेश, साथ ही खार्तूम में बड़ी भारतीय प्रवासियों की संख्या, सीधे इस अस्थिरता से जुड़ी हुई है। इसके अलावा, लाल सागर के जलमार्ग—जो भारत‑से‑पश्चिमी मध्य‑पूर्व व्यापार का रीढ़‑हड्डी हैं—पर भी ड्रोन‑आधारित खतरे की सम्भावना बढ़ रही है। भारतीय नौसेना के पैट्रोल्स पहले से ही इस दिशा में तोड़‑मैदान कर रहे हैं, लेकिन “ड्रोन‑क्षेत्र” के लिये कोई स्पष्ट विनियम नहीं है, जिससे “ड्रोन‑डिटेंशन” का जोखिम बना रहता है।

अंततः, इस क्षण के कूटनीतिक खेल को दो पहलुओं से देखना आवश्यक है। पहला, इथियोपिया और यूएई के प्रतिपक्षी बयानों में वही रीसस बेकायदा महानतरक दिखता है, जिसका उपयोग अक्सर “एनर्जी मोड” में बड़े‑छोटे रणनीतिक कदमों को वैध ठहराने के लिये किया जाता है। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का “इंस्पेक्ट‑अंड‑डिज़क्लेन” रवैया—जैसे कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तुरंत चिंतामुक्ति—शायद कोई वास्तविक समाधान नहीं बल्कि “पैकेज‑डि‑ग्लांस” है, जिससे आवश्यक जाँच‑परिक्षा को अस्थायी तौर पर ढँका जाता है।

यदि सूडान को पुनः स्थिरता के मार्ग पर ले जाना है, तो केवल राजनयिक टोकनों से नहीं, बल्कि ठोस जाँच, पारदर्शी जनसहानुभूति और क्षेत्रीय शक्ति‑संतुलन में बदलाव की आवश्यकता होगी। अन्यथा, एड़ीस-अबाबा‑की कूटनीति के “बैठक‑शून्य” पर धुंधली तिगुनी धुंध, दक्षिण‑सहारा की असमानता और भारत के व्यापारिक हित—सभी एक ही धड़कन पर धड़केंगे: एक अनंत‑दोहराते “ड्रोन‑हिट” की अंधेरी लहर।

Published: May 6, 2026