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Category: दुनिया

सूडान की राजधानी के पास रैपिड सपोर्ट फोर्सेज़ के ड्रोन स्ट्राइक में कम से कम पाँच की मौत

सूडान के परराष्ट्र विभाग ने इस शुक्रवार रात को रैपिड सपोर्ट फोर्सेज़ (RSF) द्वारा खार्तूम के बाहरी उपनगर में किए गए एक अनियमित ड्रोन हमला का खुलासा किया, जिसमें प्रमुख अधिकार संगठनों के अनुसार कम से कम पाँच व्यक्तियों की मौत हुई। RSF, जो सूडान की राष्ट्रीय सेना के साथ तीन साल से चल रहे गृहयुद्ध में प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है, ने अभी तक इस कार्रवाई का औपचारिक स्वीकृति नहीं दी।

मानवाधिकार समूहों के अनुसार, मारपीट में सिविल आबादी और संभवतः कुछ असैनिक स्वयंसेवकों को लक्ष्य बनाया गया। मौत के बाद के साक्ष्य दर्शाते हैं कि हमले का बिंदु खार्तूम के उत्तरी परिधि में स्थित एक बड़े शहरी बस्ती के निकट था, जहाँ कई भारतीय कंपनियों के ठेकेदार और उनका कार्य दल रहते हैं। भारत की विदेश मंत्रालय ने “सभी भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता” देते हुए, सूडानी अधिकारियों से कार्रवाई की पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग की है—एक मौखिक बयान जो अक्सर इशारे तक सीमित रहता है।

RSF की इस हमले की अनिर्णयता अंतरराष्ट्रीय शक्ति संरचनाओं के कई पहलुओं को उजागर करती है। मध्य पूर्व के प्रमुख मंचों—संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब—के समर्थन से सशस्त्र समूह को भारी वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता मिल रही है, जबकि पश्चिमी देशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, आधिकारिक तौर पर मानवीय सहायता की वकालत कर रहे हैं परन्तु सैन्य प्रतिबंधों को ढीला करने की ओर संकेत नहीं करते। ऐसी द्वैतवादिता नीतियों के बीच, नील-विश्वास (संधियों) और व्यावसायिक हितों के टकराव से उत्पन्न मानवीय संकट का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

तीन साल से जारी इस जटिल संघर्ष में, कई बार घोषित शांति प्रक्रियाओं ने मैदान में खड़े गुत्थी को फिर से भुने रखा है। अब तक, दोनों पक्षों ने “बिना नुकसान के” गतिशीलता का झूठा आह्वान किया है, जबकि वास्तविकता में ड्रोन और हवाई हमले की संख्या बढ़ रही है। यह अंतर नीति-घोषणाओं और ground‑level परिणामों के बीच की दूरी को स्पष्ट रूप से दिखाता है—जहाँ विदेश मंत्रालयों के शब्दों को वादे बनाकर छोड़ दिया जाता है, और वास्तविक सार्वजनिक सुरक्षा के घाव गहराते हैं।

यह घटना न केवल सूडान के भीतर हिंसा के फिर से बढ़ने का संकेत है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की असंगत जवाबदेही की भी आलोचना को प्रज्वलित करती है। “इतना कठिन नहीं होना चाहिए कि एक ड्रोन के प्रहार से पाँच लोगों की जान ले ली जाए”—ऐसे शब्दों की पृष्ठभूमि में, यह स्पष्ट होता है कि कब्ज़ा, परिसंवाद और प्रतिस्पर्धा ने मानवीय सिद्धांतों को किनारे पर धकेल दिया है। भारत को, जहाँ सूडान में कई निवेश और प्रवासी कार्यकर्ता हैं, इस अराजकता से निपटने के लिए न केवल कूटनीतिक चेतावनी, बल्कि ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है, अन्यथा “आगे बढ़ते रहो” वाले बयान सिर्फ बिंदु-चिह्न रह जाएंगे।

Published: May 3, 2026