सिंगापुर में बूलिंग के लिये लड़कों को लाठियों की सजा: नई विद्यालयीय नीति
सिंगापुर के संसद सदस्यों ने मंगलवार को एक विवादास्पद नियम पारित किया, जिसके तहत स्कूल में बूलिंग, चाहे वह वास्तविक भौतिक दुर्व्यवहार हो या साइबर‑बुलींग, करने वाले नौ साल या उस से ऊपर के पुरुष छात्रों को अधिकतम तीन लाठियों की मार से दंडित किया जा सकता है। यह ‘अंतिम उपाय’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जब सभी शैक्षिक और काउंसलिंग उपाय विफल हो जाएँ।
परिचालन के विवरण में कहा गया है कि लाठ मारना केवल तब लागू होगा जब छात्र ने दो या अधिक बार बूलिंग का प्रचलन जारी रखा हो, तथा स्कूल ने पहले सभी वैकल्पिक उपायों को दस्तावेज़ी रूप से आज़माया हो। यदि लाठियों की सजा दी जाती है, तो यह अधिकतम तीन बार तक सीमित रहेगी, और इसे केवल सरकारी मान्यता प्राप्त प्रशिक्षित अधिकारी ही लागू करेंगे।
भौतिक दण्ड को पुनः हाइलाइट करने के इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नींवों के साथ टकराव जन्मा है। संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों के मिनट के तहत शारीरिक दण्ड को ‘हिंसा’ की श्रेणी में रखा गया है, और कई देशों ने स्कूलों में इसे प्रतिबंधित कर दिया है। सिंगापुर के इस निर्णय को ASEAN के भीतर भी ‘पुरानी औपनिवेशिक सोच’ के रूप में देखी जाने की संभावना है, जहाँ कई सदस्य देशों ने हाल ही में बाल संरक्षण कानूनों को आधुनिकीकरण करने की घोषणा की है।
इसी बीच, भारत में बूलिंग के खिलाफ नीतिगत ढांचा भी तेजी से विकसित हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने स्कूलों को ‘समावेशी और सुरक्षित’ वातावरण बनाने का आदेश दिया है, और केंद्र सरकार ने 2024 में पहली बार साइबर बूलिंग के लिए विशेष दण्ड प्रावधान प्रस्तुत किए हैं। हालांकि, भारत में शारीरिक दण्ड के उपयोग के बारे में विधायी स्पष्टता अभी तक नहीं बनी है; कई राज्य अभी भी ‘दंडात्मक कार्रवाई’ के तहत छोटे स्तर के शारीरिक उपायों को अनुमति देते हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर ‘बिना हिंसा’ की प्रतिबद्धता के संकेत मिलते हैं। सिंगापुर की नई नीति इस संदर्भ में एक ‘पर्याय’ प्रस्तुत करती है, जो भारतीय नीति निर्माताओं के लिये एक अजीब सी ‘धुंधली दर्पण’ बनकर उभर सकती है।
ऐसे समय में जब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर बूलिंग की तीव्रता में वृद्धि देखी जा रही है, तो सिंगापुर का ‘लाठी‑सजाएँ‑स्पति’ समाधान कई सवाल उठाता है: क्या एक दो‑तीन झटकों की मार, जो अक्सर ‘अंतिम उपाय’ का लिप्यंतरण करती है, वास्तव में व्यवहारिक परिवर्तन लाएगी, या यह केवल प्रतिबंधात्मक कठोरता का एक दिखावा है? कई शैक्षिक विशेषज्ञों का मानना है कि बूलिंग को ‘सत्रा’ करने से कहीं अधिक प्रभावी उपाय—जैसे कि स्कूल‑आधारित मनोवैज्ञानिक सहायता, डिजिटल साक्षरता और माता‑पिता सहभागिता—पर ध्यान देना चाहिए।
कूटनीतिक तौर पर देखे तो सिंगापुर की यह घोषणा, जहाँ अभिव्यक्त स्वतंत्रता अक्सर कड़ी सामाजिक अनुशासन के साथ बंधी रहती है, एक ‘मध्यम‑आयु के रैखिक नीति‑परिवर्तन’ प्रतीत होती है। पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों ने इसे ‘असामान्य’ कहा, जबकि दक्षिण‑पूर्व एशिया के कुछ रक्षक इसे ‘वास्तविकता के अनुरूप’ मानते हैं। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी जारी की है: ‘राष्ट्रों को बाल सुरक्षा के बहस में शारीरिक दण्ड के बजाय पुनर्वासात्मक उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिए।’
समाज में निरंतर बूलिंग की समस्या को समाप्त करने के लिये केवल ‘लाठी’ नहीं, बल्कि ‘संपूर्ण शिक्षा‑परिवर्तन’ की आवश्यकता है। सिंगापुर की नई नीति इस जटिल समीकरण में एक ‘भारी‑भारी’ चिह्न जोड़ रही है—एक ऐसी पहल जो शायद भविष्य में पुनः‑विचार के लिये मजबूर कर दे, जब यह समझा जाएगा कि ‘अंतिम उपाय’ वास्तव में आखरी उपाय नहीं है।
Published: May 6, 2026