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Category: दुनिया

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सीआईए रिपोर्ट में खुलासा: इरान चार महीने तक बंदरगाह नाकाबंदी झेल सकता है, जबकि हिंदुस्तान‑यूएई समुद्री टकराव बढ़ा

अमेरिकी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) ने हाल ही में एक मूल्यांकन प्रकाशित किया, जिसमें बताया गया कि इरान के पास समुद्री नाकाबंदी का सामना कम से कम चार महीने तक करने की क्षमता है। इस आंकड़े को सुनकर कई रणनीतिक विशेषज्ञ यही सोचते हैं कि बीबीसी की तरह "सात साल की सूखी सर्दी" की भविष्यवाणी में भी थोड़ा बहुत फुंसाव है, परन्तु इस बात का आश्चर्य नहीं कि जासूस एजेंसियों को अक्सर "भावी यथार्थ" के समीकरण में आशावादी गुणांक मिलते हैं।

जो इस आंकड़े को वास्तविक चुनौती में बदल देता है, वह है स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज में फिर से धड़कता झगड़ा। एक महीने पहले लागू हुए अस्थायी युद्धविराम के बाद, इस जलधारा में पिछले दो दिनों में ही सबसे बड़े दांव‑पैरों की बौछार देखी गई। पाँच मई को, यु.ए.ई. की जलमार्गों पर दुश्मन‑समर्थित रॉकेट विस्फोट ने समुद्री सुरक्षा को फिर से प्रश्नचिह्न में डाल दिया, और फिर आठ मई को दुबारा उसी क्षेत्र में लक्षित हमले हुए।

उन्हीं क्षणों में, इरान के निरस्त्र एवं पक्षपाती बयानबाज़ी ने माहौल को और अधिक धुंधला कर दिया। एक आधिकारिक प्रवचन में जलधारा को "अंतरराष्ट्रीय जल अधिकारों के उल्लंघन" कहा गया, जबकि उसी प्रवचन में यह भी कहा गया कि इरान की नौसैनिक क्षमता में कोई कमी नहीं है। ऐसे दोहरे मानक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिकी-इज़रायली गठबंधन द्वारा जारी कठोर आर्थिक प्रतिबंधों की तुलना में अधिक यथार्थवादी दिखते हैं, जो अक्सर "वापसी नापसंद" की सीमा में रह जाते हैं।

भारत के लिए यह परिदृश्य महज एक दूरी पर घटित नहीं हो रहा है। स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज वह प्रमुख जलधारा है जिससे लगभग 20 % भारत के तेल आयात गुजरते हैं। इस जलमार्ग में किसी भी दीर्घकालिक व्यवधान का देश के ऊर्जा मूल्य, व्यापार संतुलन और मौद्रिक नीति पर सीधा असर पड़ेगा। भारत ने अब तक इस मुद्दे को "समुद्री सुरक्षा के व्यापक हित" के रूप में वर्गीकृत किया है, लेकिन एक ही समय में वह यू.एस.-इज़रायल की नीतियों के विरोध में कई बार अपने मुख्य व्यापार साझेदारों को अनदेखा कर रहा है। इस द्विआधारी खेल में, भारत की नौसैनिक तैनाती तो बढ़ी है, परन्तु राजनीतिक रूप से वह अक्सर "ऊपर से नीचे तक प्रतिबिंबित" वाले बयानबाज़ी में फँस जाता है।

विश्व स्तर पर, इस संघर्ष का असर केवल तेल के मूल्य तक सीमित नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय वैर-विवाद के कई मंचों पर, यू.एस. की "फ़्री डॉम ऑफ़ नेविगेशन" के कथन को इरान‑समर्थित मिलिशिया समूहों ने "हिंसा के नया रूप" करार दिया है। इसी के बीच, यूरोपीय संघ ने अपने मौजूदा प्रतिबंधों को "समीक्षा के अधीन" कहकर दोधारी तलवार चलायी है—एक ओर इरान को आर्थिक रूप से दबाव डालना, और दूसरी ओर एशिया‑पैसिफिक देशों को व्यापार के अवसर प्रदान करना। ऐसा प्रतीत होता है कि बड़े खेल में “शांति” शब्द का प्रयोग शायद किसी क़िस्म के "न्यूट्रलिको" की तरह किया जा रहा है, जिसका वास्तविक प्रयोग केवल दूरबीन से देखा जा सकता है।

इन सब के मध्य, सीआईए की चार‑महीने की सहनशीलता रिपोर्ट का शुष्क सार यह है कि इरान की रणनीतिक गहराई को जटिलता से समझना कठिन नहीं। लेकिन इस रिपोर्ट की प्रासंगिकता तभी सामने आएगी, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर भारत, अपने समुद्री सुरक्षा मंच को सुदृढ़ करने के साथ‑साथ वैकल्पिक तेल आपूर्ति श्रृंखलाओं की खोज में भी निवेश करेगा। नाकाबंदी के चार महीने अस्थायी लक्षण हो सकते हैं, परंतु जलधारा में लगातार फटती गड़गड़ाहट को बंदरगाह पर सच्ची "बचाव योजना" कहने के लिए अभी बहुत दूर है।

Published: May 9, 2026