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वियतनाम बन गया भारत के एक्ट ईस्ट नीति का प्रमुख स्तम्भ, मोदी ने कहा
नई दिल्ली – भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 मई को वियतनाम के राष्ट्रपति और वियतनाम कम्युनिस्ट पार्टी के सीजी के जनरल सेक्रेटरी टॉ लँ का स्वागत करते हुए कहा कि वियतनाम भारत की एक्ट ईस्ट नीति में "मुख्य स्तम्भ" है। दो देशों के बीच रणनीतिक संवाद का यह चरण, चीन के बढ़ते समुद्री दबाव के मद्देनज़र, दोनों राष्ट्रों के समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तेज करने की दिशा में एक और कदम है।
केंद्रीय कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में, मोदी ने वियतनाम को "विप्रयुक्त आंतरिक‑बहुपक्षीय मंच" कहा, जो नई प्रौद्योगिकियों और व्यापार को बढ़ावा देने में भारत के प्रयासों को सुदृढ़ करेगा। यह बयान द्विपक्षीय वार्ता के बाद आता है, जिसमें द्विकोणीय व्यापार पर 30 % वृद्धि लक्ष्य, रक्षा‑क्षेत्र में संयुक्त अभ्यास, तथा हड़ताल‑रहित समुद्री मार्गों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता पर सहमति बनी।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारत‑वियतनाम संबंध 1950 के दशक से द्विपक्षीय सहयोग की नींव पर स्थापित हैं, परंतु दूरस्थ दक्षिण‑पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति अक्सर शब्दों की बस्ती बनती रही, जबकि ठोस परियोजनाओं की धरातल पर उन्नति धीमी रही। इस नज़रिए से मोदी का बयान, जिसमें "मुख्य स्तम्भ" शब्द दोहराया गया, एक तरह से संसद और उद्योग मण्डलों को याद दिलाता है कि रणनीतिक साझेदारी केवल बैनर से नहीं, बल्कि निरंतर निवेश व वास्तविक कार्यान्वयन से मापी जानी चाहिए।
वियतनाम के राष्ट्रपति टॉ लँ ने भारत के साथ सहयोग को "आर्थिक विकास, तकनीकी नवाचार और जलवायु अनुकूलन" के क्षेत्रों में विस्तारित करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि एशिया‑पैसिफिक में भारत के आँसर को स्थानीय उद्योगों के लिए एक नई बाजार‑प्लेटफ़ॉर्म के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भारतीय कपड़ा, फार्मास्यूटिकल और आईटी कंपनियों को निर्यात‑वॉल्यूम बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
भू‑राजनीतिक संदर्भ में, यह रिश्ता दक्षिण‑चीन सागर में चीन की सैन्य सक्रियता के प्रतिप्रेषण के रूप में पढ़ा जा रहा है। एक्ट ईस्ट नीति, जो पहले भारत के आइखा-आधारित द्वीप-समुद्र नीति के साथ जुड़ी थी, अब ASEAN के सहयोगी देशों के साथ बुनियादी बुनियादी ढांचे के जाल में आगे बढ़ रही है। आलोचनात्मक आवाज़ें यह तर्क देती हैं कि यदि दिल्ली इस साझेदारी को कागज पर नहीं, बल्कि कंक्रीट पर उतारती नहीं, तो यह केवल विदेश नीति की अभिजात्य अभिव्यक्ति बन कर रह जाएगी।
अंत में, भारतीय उद्यमियों और निवेशकों को इस नई दिशा में आकर्षित करने के लिये, दोनों देशों ने एक विशेष आर्थिक संवाद मंच की स्थापना का प्रस्ताव रखा। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह वियतनाम को भारत के "नव ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचा" की प्राथमिकता वाले देशों की सूची में ऊँचा स्थान दे सकती है, और भारत को दक्षिण‑पूर्व एशिया के व्यापारिक मानचित्र पर एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित कर सकती है।
Published: May 7, 2026