वीनिस बिएनाल में धुंध, विरोध और पावर्डी: 61वीं प्रदर्शनी का अँधेरा आरंभ
वीनिस में 5 मई को शुरू हुई 61वीं बिएनाल का वैरनिशेज़, न केवल लगातार बरसते बारिश के बादलों से, बल्कि राजनीतिक कण्ठस्थता और स्पष्ट विरोधी-प्रवर्तनों से घिरा रहा। इस वर्ष के मंच पर भौतिक मौसम के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य की आँधी भी तेज़ी से चल रही है।
रूसी पविलियन की दरवाज़ा बंद ही नहीं, यह ‘स्थायी रूप से बंद’ की घोषणा भी उन लोगों के लिये आश्चर्य का कारण बनी, जिन्होंने हल्के‑फुल्के कला को राजनयिक रीढ़ के साथ जोड़ने की परिपाटी को चुनौती दी। इस कदम का औचित्य रूस‑इज़राइल संबंधों के बीच के तनाव से जोड़ा गया, जबकि इज़राइल के पावर्डी में भागीदारी को लेकर भी कई शहरों में प्रदर्शन हुए। ‘इज़राइल को मंच देना, युद्ध में पंख फड़फड़ाना’ की युक्ति ने एकसाथ दो विरोधी ध्वनि को एक ही मंच पर लाया।
और वहीं, यूके की पविलियन में लुबाइना हिमिद ने ‘एक परफेक्ट ब्रिटिश समर’ के नाम से ध्वनि‑कोलाज़ और बड़े आकार के पैनल प्रस्तुत किए। उनका काम, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास को छेड़ता है, परिस्थितियों के उलटफेर को स्मरण कराता है: धुंधलें वसंत में भी, पैनल पर ‘सूरज का प्रकाश’ गूँजता है, जबकि बाहर बरसात का राजनैतिक स्याह बादल घिरा रहता है।
इन घटनाओं के बीच कई प्रमुख क्यूरेटर और प्रबंधन कर्मी ने पदत्याग किया, यह दर्शाता है कि बिएनाल अब केवल कला ही नहीं, बल्कि ‘संस्थागत भरोसे का कसौटी’ बन गई है। जहाँ एक तरफ़ आयोजक ‘संकल्प और समानता के बैनर’ ताने, वहीं दूसरी तरफ़ ‘विरोध का दांव’ खेला जा रहा है, यह द्वैनिकस्थिति संस्थागत आत्मसमीक्षा की माँग करती है।
भारतीय पाठकों के लिये इस महाप्रदर्शनी की चमक-धूमिल दो पहलुओं में प्रकट होती है। पहला, भारत के अपने पावर्डी में लगातार बढ़ते सहभागिता को देखते हुए, इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजनीतिक दबाव के विरुद्ध अपनी सांस्कृतिक नीति को कैसे संरेखित करे, वह प्रश्न बनता है। दूसरा, भारत‑रूस और भारत‑इज़राइल के बीच चल रही सूक्ष्म कूटनीति, जहाँ आर्थिक और सुरक्षा सहयोग के साथ-साथ सांस्कृतिक संवाद भी मापी जा रही है, इस बिएनाल की प्रोटेस्ट से प्रभावित हो सकती है।
सारांश में, 61वीं बिएनाल ने दिखा दिया है कि ‘कला’ अब एक स्वतंत्र द्वीप नहीं रह गई; वह वैश्विक शक्ति‑संरचनाओं, कूटनीतिक द्वंद्वों और संस्थागत आत्म‑विचार का संगम स्थल बन गई है। जबकि दूरस्थ इज़राइल‑रूसी मुद्दे मंच को हिला रहे हैं, लुबाइना हिमिद जैसे कलाकारों का काम हमें याद दिलाता है कि कला का सचेत सतह, अक्सर धुंध और बारिश के पीछे छिपे जटिल सत्य को उजागर कर सकता है। यह विरोध-प्रकाश की द्वैधता, संभावित रूप से, भविष्य की बिएनाल को भी इसी प्रकार ‘संकट‑संकल्प’ के मिश्रण में जारी रखने की चेतावनी देगी।
Published: May 6, 2026