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Category: दुनिया

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वेनेज़ बिएनाले में रूस की पुनः हिस्सेदारी पर अंतरराष्ट्रीय विरोध की लहर

वेनिस बिएनाले, जो हर दो साल में विश्व के शीर्ष कलाकारों को एक मंच पर लाता है, ने इस वर्ष अपना सबसे विवादास्पद निर्णय लिया – रूस को फिर से पवेलियन प्रदान करना। यह पहला मौका है जब रूसी प्रतिनिधि, 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण‑स्तरीय आक्रमण के बाद, इस प्रतिष्ठित कला मेले में भाग ले रहे हैं।

निर्णय के कुछ ही घंटों बाद, वेनिस की सड़कों पर सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने “युद्ध को नज़रअंदाज़ न करो” के नारे लगाते हुए विरोध किया। वेनिस शहर में तैनात पुलिस को भी रोकने की कोशिश की गई, क्योंकि समूह ने बिएनाले की आधिकारिक सभाओं और पवेलियन के सामने धूम्रपात‑रहित रैली आयोजित की। विरोध के नेता यह दावा करते हैं कि कला को एंटी‑इंफ़्रास्ट्रक्चर बनाकर सैन्य विवाद को पृष्ठभूमि में धकेलना शास्त्र के विरुद्ध है।

इस निर्णय के पीछे इटालियन संस्कृति मंत्रालय और बिएनाले के निदेशक एलेना फ्रैटेल्ली की टेबल पर कई महीनों की व्याख्यात्मक बैठकें रही। उनके अनुसार, “कला को कई बार द्वंद्व के बीच से गुजरना पड़ता है, और इसे पूरी तरह अलग‑थलग करना हमें इतिहास से भी दूर कर देता है।” यह तर्क, हालांकि, कई संकाय और सांस्कृतिक नीतिनिर्माताओं के लिए सुनाई देने वाले “काली धुंध” की तरह बना रह गया, जो मांगते हैं कि “क्लासिक अमेरिकी नॉन‑इंटर्वेंशन” की तरह, सांस्कृतिक संस्थान भी अपने दिलों की धड़कन पर प्रतिबंध लगाएं।

वैश्विक स्तर पर यह विवाद नई कूटनीतिक सीमा रेखाओं को उजागर करता है। यूरोपीय संघ ने 2022 के बाद से रूसी फर्नीचर, फिल्म, और संगीत पर कठोर प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि कई देशों ने “साँस्कृतिक बहिष्कार” की नीति अपनाई। फिर भी, कुछ विचारधारियों को यह लग रहा है कि कला को “सुविचारक” मानना और उसकी “सतह पर” ही ठोस नीति बनाना, एक ही बौछार में दो मछलियों को पकड़ने जैसा है।

इन बहसों में भारत का स्थान अति विशेष रूप से चिह्नित है। भारत ने युद्ध के बाद अपनी औद्योगिक, वैज्ञानिक, और तकनीकी साझेदारियों में रूसी संगतियों को बनाए रखा है, जबकि यूक्रेन से भी मानवीय सहायता जारी रखी है। भारतीय कलाकारों के समूह ने इस बिएनाल में भागीदारी के लिए अपनी शर्तें रखी थीं – जैसे कि पैलेस में “शांति” थीम को प्रमुखता देना और दोनों पक्षों के कार्यों का समान मंच प्रदान करना। जबकि यह पहल भारतीय विदेश मंत्रालय के “अभिरुचि‑मुक्त” (non‑aligned) दृष्टिकोण को दर्शाती है, यह भी संकेत देती है कि भारतीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को द्विपक्षीय तनावों में फँसाने की संभावना अभी भी मौजूद है।

नीति‑परिणाम स्पष्ट हैं: बिएनाले की इस गलती ने कई देशों को अपने कला‑संबंधी राजनयिक पोर्टफोलियो पर पुनर्विचार करने पर बाध्य किया है। अगर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ “स्वतंत्र कला” का बहाना देकर अंतर्राष्ट्रीय कानून की अनदेखी करती रहेंगी, तो भविष्य में अधिक संस्थागत “अधिवास” और “विरोधी‑सिल्वर‑लेन” की लहरें उदित होंगी।

जबकि वेनिस में सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित कर दिया, लेकिन बिएनाले के प्रमुख आयोजकों ने अंततः इस आपदाजनक स्थिति को “कला की बहस के भागीदारी के रूप में” वर्गीकृत कर दिया। यह कहा जा सकता है कि अब “शो को देखो, जंग को अनदेखा करो” वाला नारा केवल विज्ञापन नहीं, बल्कि एक राजनयिक परिपत्र बन गया है।

Published: May 7, 2026