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Category: दुनिया

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विक्टोरिया में 'एनी' गैसफ़ील्ड को लाइसेंस, समुद्री पारिस्थितिकी और जलवायु लक्ष्य धूमिल

ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य और संघीय लेबर सरकार ने गुरुवार को एक नई गैस उत्पादन लाइसेंस को आधिकारिक रूप से स्वीकृति दी। इस लाइसेंस के तहत Amplitude Energy की एनी गैसफ़ील्ड, ओटवे बेसिन के समुद्र तट के पास स्थित, 2028 तक उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखती है और राज्य की कुल गैस आपूर्ति का लगभग एक‑तिहाई हिस्सा लेकर आएगी।

पर्यावरण संगठनों ने तुरंत इस कदम की निंदा की, यह तर्क देते हुए कि यह ‘प्रेस्टिन ओशन एनवायरनमेंट’—जिन्हें अक्सर ऑस्ट्रेलिया की सबसे शुद्ध समुद्री क्षेत्रों में गिना जाता है—को जोखिम में डालता है। वे कहते हैं कि इस प्रकार की नई गैस परियोजना से जलवायु सुरक्षा के मार्ग पर अतिरिक्त बाधा उत्पन्न होगी, जबकि ऑस्ट्रेलिया ने अंतर्राष्ट्रीय जलवायु समझौतों में कटिबद्धता का दावा किया है।

ओटवे बेसिन में इस प्रकार के ड्रिलिंग कार्यों को दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रुझान के बीच टकराव के रूप में देखा जा सकता है: एक ओर वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश तेज़ हो रहा है, तो दूसरी ओर कुछ ऊर्जा‑संपन्न देशों की निर्यात आय को सुरक्षित रखने के लिए गैस एवं कोयला प्रोजेक्ट्स को फिर से जीवित किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया, जो पहले से ही एशिया‑पैसिफिक में LNG निर्यात का बड़ा खिलाड़ी है, इस नए परियोजना से अपनी निर्यात क्षमता को बढ़ा कर भारत जैसे बड़े LNG आयातकों के बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।

भारत के लिए इस विकास का दोहरा प्रभाव है। एक तरफ, बढ़ते ऑस्ट्रेलियाई LNG आपूर्ति से भारत की ऊर्जा सुरक्षा में अतिरिक्त बफर मिल सकता है, विशेषकर जब घरेलू ग्रीनहाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा मंच पर अभी भी संक्रमण की प्रक्रिया जारी है। दूसरी ओर, भारतीय जलवायु कार्यकर्ता इस बात को लेकर सतर्क हैं कि विदेशी आपूर्ति को बढ़ाते हुए देश का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन लक्ष्य और दूर नहीं होगा। भारत ने 2030 तक अपने अपकेंद्रित उत्सर्जन को 40‑45 % तक घटाने की प्रतिबद्धता जताई है; परंतु अगर निर्यात‑उन्मुख गैस विकास को प्रोत्साहन मिलता रहता है, तो वैश्विक स्तर पर ‘कार्बन बजट’ घटता ही रहेगा।

नीति‑निर्माताओं के बीच का विरोधाभास यहाँ स्पष्ट है: वही सरकारें जो जलवायु विश्वसनीयता का दावा करती हैं, वे मौद्रिक, रोजगार और निर्यात‑आधारित प्रेरणाओं के कारण नई फॉसिल‑फ्यूल परियोजनाओं को मंजूरी देती हैं। इस दोहरी पहेलियों का परिणाम अक्सर जमीनी स्तर पर स्थानीय मछुआरों और पर्यटन उद्योग के लिए नुकसान में निकलता है, जहाँ ओटवे बेसिन के ‘ट्वेल्व अपोस्टल्स’ जैसे दृश्यात्मक आकर्षण पर्युद्ध जलवायु‑संकट के पीछे धुंधला पड़ते हैं।

जैसे-जैसे इस गैसफ़ील्ड की योजना आगे बढ़ेगी, भारत के नीति‑निर्माताओं को यह प्रश्न उठाना पड़ेगा कि समुद्री आयात के बजाय घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को प्राथमिकता देना कितना व्यावहारिक है। अंततः, ऑस्ट्रेलिया की इस नई गैस परियोजना का भविष्य यही तय करेगा कि वह ‘जलवायु-अनुकूल विकास’ के शब्दों को व्यावसायिक वास्तविकताओं के साथ कितना सम्हाल पाता है, या फिर वह वही पुरानी नीति‑समाज के बीच का ‘मीठा-मीठा दर्द’ बनकर रह जाता है।

Published: May 7, 2026