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Category: दुनिया

लेबनान में शांति हासिल करना युद्ध जीतने से अधिक कठिन

लेबनान, जो अपने 6,000‑वर्षीय सभ्यता‑स्मारकों के बीच राजनीतिक अराजकता को लेकर मशहूर है, अब एक ऐसा मोड़ पर खड़ा है जहाँ शांति की जद्दोजहद युद्ध जीतने की तुलना में कई गुना जटिल दिखती है। 1975‑1990 के गृहयुद्ध, सायप्रस‑इज़राइल संघर्ष का विस्तार, 2005 में सीरियाई बलों की वापसी, और 2020 में बृहस्पति दुर्व्यवस्था तक, प्रत्येक अध्याय ने देश के संस्थागत ढांचे को और अधिक पतला कर दिया।

नए जियो‑पॉलिटिकल परिदृश्य ने तानाशाहियों के बजाय मण्डलीय संघर्ष को रेखांकित किया है। ईरान‑हिज़की लहर ने सीरिया‑राहू के साथ मिलकर लेबनानी ढाँचे को उलझा दिया, जबकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने आर्थिक राहत के इनाम में मेला बिठाया। इस बीच अमेरिका धीरे‑धीरे अपने तेज़‑ताकी वाले मोर्चे को इज़राइल‑लेबनान सीमाओं की निगरानी में बदला, जबकि यूरोपीय संघ ने “शर्त‑बद्ध सहायता” का बहाना बना कर बुनियादी ढाँचे की बहाली को रोका।

रातों-रात नहीं, बल्कि इस संघर्ष की जड़ें 1943 के राष्ट्रीय समझौते में छिपी हैं—जिसमें मलीशिया, सूनि, द्रुज़ और सहारी समुदायों को असमान शक्ति‑संतुलन में बाँटा गया। 1991 के तालाबंद मोसाद संधि ने सीरिया को ‘संरक्षक’ बना दिया, जबकि हिज़की ने अपनी शक्ति को ‘अँधेरा’ बना कर स्पष्ट किया: “हमारे पास पत्ते नहीं, बल्कि मोती हैं।” इस तरह असमानता ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मौन कर दिया।

नया परिप्रेक्ष्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर जारी “शांति‑बयानों” का अक्सर वही खाली कागज रहता है, जिस पर “काफी छापे” नहीं होते। संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी बल (UNIFIL) ने 40 वर्षों से बेनजैज़ी के समुद्री तट पर अपना “शांतिपूर्ण” पदचिह्न छोड़ दिया, पर कबुलियत है कि असली शांति की बुनियाद आर्थिक स्थिरता और सामाजिक समानता से जुड़ी है, न कि केवल सशस्त्र निरोध से।

भारत की इस परिप्रेक्ष्य में भूमिका सटीक रूप से दोहरी है। 2003 में भारत ने लिविंग‑स्टेट समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे अपने लेबनानी प्रवासी कर्मचारियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। फिर भी, भारत ने अपने पारंपरिक ‘नॉन‑एलाइंजमेंट’ एंगेजमेंट को बड़े स्तर पर नहीं दिखाया, जबकि भारत‑संयुक्त राष्ट्र में कई बार शांति रखरखाव के लिए “भूमिका को पुनः परिभाषित करने” की पुकार उठी। एक ओर भारत की निर्यात‑निर्भर ऊर्जा प्राथमिकताएँ इज़राइल‑लेबनान सीमा पर उजागर होती हैं; दूसरी ओर, भारतीय कंपनियों को आर्थिक मंदी के कारण लेबनान में निवेश की आशा खोनी पड़ती है।

व्यावहारिक तौर पर, शांति की दिशा में सबसे बड़ा बाधा नीतियों और वास्तविकताओं के बीच की दूरी है। जब सऊदी अरब “इंटरनैशनल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट” के माध्यम से $ 5 बिलियन से अधिक के “रिवाइज़र” पैकेज की घोषणा करता है, तो लेबनान के बैंक सिस्टम में बिकेमिया भरे रिपोर्ट मौजूद होते हैं जो दिखाते हैं कि “सही बजट” अभी भी धुंधला नहीं है। इस चक्र में, “शांतिपूर्ण समाधान” के शब्द ठण्डे पानी में तैरते पायलटों की तरह दिखते हैं—दूरस्थ, परंतु कभी‑कभी तेज़ी से उतरते नहीं।

ड्राई वियत के साथ एक सट्टा‑अभिनय को जोड़ते हुए कहा जा सकता है कि अगर वैश्विक शक्ति‑संरचनाएँ लेबनान की गहराई से झलकती असमानताओं को नज़रअंदाज़ करती रहें, तो “शांति की जीत” एक निरर्थक सिद्धांत बनेगी। हमें न केवल पुराने युद्ध‑क्षेत्र को पुनः मानचित्रित करना चाहिए, बल्कि नई शक्ति‑संतुलन के साथ बुनियादी शर्तों—ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा—को भी पुनः व्यवस्थित करना होगा। तभी वह अदृश्य “शांति-युवा” का मंच तैयार हो पाएगा, जहाँ भारत जैसी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाएँ भी विश्व मंच पर वास्तविक मध्यस्थ बन सकें।

Published: May 4, 2026