रूस ने अफ्रीकी श्रमिकों को धोखा देकर सैनिक बना दिया
पिछले दो वर्षों में मॉस्को ने अफ्रीका के कई देशों से बड़ी संख्या में युवा पुरुषों को “रोजगार‑सुरक्षा” के नाम पर आकर्षित कर, उन्हें सीधा खाड़ी के युद्ध‑क्षेत्र में भेजा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों के प्रारंभिक प्रकाशनों के अनुसार, ये प्रकट नहीं‑हुए भर्ती एजेंटों ने ठोस नौकरी, उच्च वेतन और वीज़ा की गारंटी दी, जबकि वास्तविक लक्ष्य तो रूसी सैन्य इकाइयों में भरती था।
रूस की सेना, जो निरंतर कमज़ोर होती भर्ती आंकड़ों के कारण वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में थी, इस योजना को 2024 के अंत में आधिकारिक रूप से शुरू नहीं कर सकता था; इसलिए उसने निजी फर्मों को “नौकरी‑स्थापना” के ढाँचे में काम करने को कहा। इन फर्मों ने अफ्रीका के सबसे ज़्यादा बेरोजगार देशों—जैसे माली, सोमार, और इकटोपीआ—में विज्ञापन देकर युवाओं को अफ्रीकी विदेश मंत्रालयों से अप्रत्यक्ष तौर पर लाइसेंस दिलवाए।
भर्ती प्रक्रिया में अक्सर सिमित दस्तावेज़ीकरण, वादा‑शब्दी अनुबंध, और अत्यधिक शीघ्र ट्रेनिंग कैंप शामिल होते थे। कई बार, प्रार्थी को यूरोपीय या बोट्स के माध्यम से “विज़ा‑सॉल्यूशन” बताया जाता, पर अंत में वह एक रूसी विमान में बैठकर यूक्रेन के पूर्व‑मुक्त क्षेत्रों की ओर ले जाया जाता। घुसपैठ‑ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही चतुराई है—रूस ने औपचारिक स्वीकृति से बचते हुए अपनी “भर्ती‑डॉट‑कॉम” को एक अंतरराष्ट्रीय गड़बड़ी बनाकर रखा।
इसे केवल एक ‘रोजगार‑रक्षा’ परिदृश्य नहीं कहा जा सकता; यह अंतरराष्ट्रीय श्रम‑सुरक्षा और युद्ध‑कानून का दोहरा उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र की विशेष निरीक्षक रिपोर्ट ने कहा कि यह मॉडल “मानव तस्करी और सैनिक भर्तियों के बीच की धुंधली रेखा” को और धुंधला कर रहा है। साथ ही, अफ्रीका के कई सरकारें इस बहरीकरण के आरोपों को नकारते हुए कहते हैं कि वे केवल “माइग्रेशन वार्म‑अप” को एक वैध प्रक्रिया मानते हैं, जिससे रूस को अपना “साम्राज्यिक विनाश‑सुधार” जारी रखने का अनकहला औज़ार मिलता है।
भारतीय पाठकों के लिए इस घटना का सीधा असर दोहराने लायक है। भारत भी अफ्रीका में शिक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर सहायता के माध्यम से खोले गए द्विपक्षीय संबंधों के कारण समान “रोजगार‑वादा” से सक्रिय रूप से जुड़ा है। हालिया देखे गए प्रवासी नीती में कहा गया कि विदेश में रोजगार अवसरों की तलाश करने वाले भारतीय युवाओं को भी ऐसी ही थापे के जाल में फँसने का खतरा है, विशेषकर जब वे रूसी भाषा का प्रशिक्षण या “रूस‑भारत व्यापारिक” वर्कशॉप में भाग लेते हैं।
अंततः, रूस की यह रणनीति अपनी अस्थिरता के कारण विश्वसनीयता खो रही है। जबकि यह “शेयर‑प्रोफ़िट” मॉडल को “सैन्य‑प्रशिक्षण” में बदलने का प्रयास करता है, इसकी पीड़ितों की आवाज़ें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूँजने लगी हैं। नियामकों के बीच विफलतापूर्वक पारदर्शिता की कमी और “रोजगार‑हमारा‑पहला‑पद” की झूठी बहाने पर आधारित यह नीति‑रंगभूति शायद जल्द ही रियायत‑ऊँचा मूल्य के साथ रोकी जाएगी—किसी भी बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिकों, भारतीय समावेशी, के लिए चेतावनी के रूप में।
Published: May 5, 2026