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Category: दुनिया

रूस की अफ्रीकी भर्ती: यूक्रेन युद्ध में मजबूरियती लड़ाकों की बढ़ती कतार

पिछले दो वर्षों में अफ्रीकी महाद्वीप के कई देशों में पुरुषों ने बताया कि उन्हें रूस से "उच्च वेतन वाली नौकरी" या "व्यावसायिक प्रशिक्षण" का वादा करके भर्ती किया गया। वास्तविकता में, इन लोगों को अक्सर मध्य या पूर्वी यूरोप के मोर्चों पर ले जाया जाता है, जहाँ उन्हें यूक्रेन के संघर्ष में अनिच्छापूर्ण रूप से सिपाही या निजी सुरक्षा गढ़ (mercenary) के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

रूस की इस रणनीति की जड़ें 2022 में शुरू हुई व्यापक भर्ती के बाद की कमियों में हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी फौज को दीर्घकालिक टर्नओवर और संख्यात्मक घटाव का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वह वैकल्पिक भर्ती स्रोतों की तलाश में है। अफ्रीका, जहाँ आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक अराजकता मौजूद है, वह इस मीठी‑खट्टी पेशकश का आसान लक्ष्य बन गया।

मुख्य कनेक्शन बिंदु कई अफ्रीकी देशों में स्थित “रोजगार एजेंसियां” हैं, अक्सर रूस की रॉयल एयरफोर्स या रक्षा मंत्रालय के वीजी (Wagner Group) के निकट सहयोगी कंपनियों द्वारा संचालित। इन एजेंसियों में साक्षरता स्तर, स्थानीय गरीबी, और बेरोजगारी के आँकड़े अक्सर भर्ती प्रक्रिया को छिपाते हैं। एक बार लक्ष्यभेदभूमि पर पहुँचने के बाद, उनका प्रशिक्षण वैध सेना के मानकों से नहीं, बल्कि निजी सैन्य कंपनियों के तेज‑तर्रार, कम-समझौता वाले कोर्सेस से तय किया जाता है।

इस विस्तार का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रभाव हैं। यूरोपीय संघ ने इस पर कई बार आपराधिक आरोप लगाए हैं, लेकिन गंभीर प्रतिबंध या वैध कानूनी कार्रवाई की कमी इस बात की ओर संकेत देती है कि वैश्विक ऊर्जा और सैन्य संतुलन अभी भी रूसी प्रभाव को रोक नहीं पाया। संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार आयोग कई बार इस “बनावटी भर्ती” को झूठा मानव तस्करी माना, पर निष्पादन में अक्सर राजनीतिक समझौते ही मार्ग बनते हैं।

भारत के लिए यह घटना दोहरी चिंता का कारण बनती है। एक ओर, कई भारतीय छात्र और कामगार भी रूस में शिक्षा और रोजगार के लिये आकर्षित होते हैं; दूसरी ओर, नई दिल्ली ने बार‑बार रूस‑उकसाए गए संघर्षों में अप्रत्यक्ष रूप से संभावित सहभागिता से बचने की सिफ़ारिश की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अफ्रीकी देशों को चेतावनी दी है कि रूसी ‘रोजगार’ के लालच में फँसकर उनके नागरिकों की सुरक्षा को समझौता न किया जाए। साथ ही, भारत की बढ़ती ऊर्जा निर्भरता को देखते हुए, इस तरह की कूटनीतिक असंतुलन नई दिल्ली को मध्यस्थता की भूमिका में रखेंगी, जहाँ वह रूसी ऊर्जा हितों और अंतरराष्ट्रीय मानवीय मानकों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

यदि हम इस पर हल्का‑फ़ुल्का व्यंग्यात्मक टिप्पणी करें, तो कहा जा सकता है कि रूस ने “रोजगार की खोज” को “रिपर्टोयर का इतिहास” बना दिया, जहाँ नौकरी के विज्ञापन में ‘सैन्य सेवा’ को ‘अधिकतम लाभ’ के साथ मिलाकर पेश किया गया है। यह पुराने ‘सिविल सेवा’ के मिथ्य साझाकरण को बदलते युग की नई ठगी बनाता है – एक ऐसी भर्ती पद्धति जहाँ ‘स्थायी पद’ की जगह ‘अस्थायी मोर्चे’ रखा गया है।

अंततः, इस प्रथा की निरंतरता यह सवाल उठाती है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय किस हद तक रूसी रणनीति को चुनौती दे सकता है, जबकि अफ्रीकी सरकारों को भी अपने नागरिकों को इस तरह की धोखाधड़ी‑भरी नौकरियों से बचाने की जिम्मेदारी है। नज़दीकी भविष्य में यदि अधिक देशों ने कठोर पाबंदियां और वैध निगरानी तंत्र स्थापित किए, तो यह “भर्ती‑वादा” की कहानी शायद अपने अंत में एक चेतावनी पुस्तक बन कर रह जाएगी, न कि एक औसत मानवीय संघर्ष का हिस्सा।

Published: May 4, 2026