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Category: दुनिया

रूस और यूक्रेन ने अलग-अलग शांति प्रतिबंध लागू किए, अंतरराष्ट्रीय शर्तों पर सवाल

मई की पहली सप्ताह में दो प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों ने एक ही शब्द — ‘शांति प्रतिबंध’ — को दो अलग‑अलग तिथियों पर लागू किया। रूस ने 8 तथा 9 मई को, अपने ऐतिहासिक विजय दिवस के उद्दीपन पर, एक सीमित युद्धविराम की घोषणा की। इसके विपरीत, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमीर ज़ेलेंस्की ने 5 और 6 मई को स्वयं निर्मित शांति‑प्रोटोकॉल लागू करने का इशारा किया। दोनों पहलें, बिना किसी सामूहिक समझौते के, केवल राष्ट्रीय कैलेंडर के सिद्धांतों पर आधारित रहीं।

समयक्रम की ताल देखी जाए तो यह स्पष्ट है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के गंभीर संकेतों को नहीं सुना— या नहीं सुनना चाहते। रूस की घोषणा, स्टालिन के बंधु‑सैनिक छापे की स्मृति में, एक ‘विजय दिवस’ के स्वर में पिरोहणित थी; जबकि ज़ेलेंस्की का कदम, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के निराशा‑जन्य आशा‑परिचर्या से प्रेरित, शेष संघर्ष‑पक्षियों को एक अस्थायी सांस लेने की अनुमति देने का प्रयास माना गया।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, इस दो‑पायलट मॉडल का असर सीमित प्रतीत होता है। संयुक्त राष्ट्र के शांति‑रक्षक, जिसकी ताज़ा रिपोर्टें अक्सर बड़े‑बड़े औपचारिक शब्दों में घिरी रहती हैं, इस पर तनावपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं दे पाई। यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोगी मंच (ЕС) ने “प्रमाणित शांति” की मांग की, पर वास्तविकता में दोनों पक्षों के बीच समन्वय की कमी ने किसी ठोस परिणाम को जन्म नहीं दिया। यहाँ तक कि नई मिलिशिया गठबंधन के प्रमुख सदस्य, जैसे भारत, ने पारदर्शी तौर पर “संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान” की वकालत की, पर दोनों पक्षों के वैचारिक अंतर को देखते हुए, भारत का मध्यस्थता प्रस्ताव अब तक केवल कूटनीतिक शब्दावली में ही रह गया है।

नीति-प्रभाव की बात करें तो, रूसी युद्धविराम का प्राथमिक उद्देश्य घरेलू एकजुटता को बढ़ावा देना था— एक बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय उत्सव के साथ सार्वजनिक मनोबल को सुदृढ़ करना। इसी प्रकार, ज़ेलेंस्की के प्रतिबंध का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के सामने मानवीय जिम्मेदारी को उजागर करना था, ताकि यूक्रेन को अतिरिक्त समर्थन के अवसर मिल सकें। दोनों ही ‘क्रमिक’ शांति‑उपाय, युद्ध के बड़े‑पैमाने के पुनरुद्धार को रोकने के बजाय, केवल अस्थायी रुकावटें बना कर रह गए।

अंततः, ये दो असंगत शांति आयुध, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की एक चक्रीय विफलता को रेखांकित करते हैं: जब राष्ट्र‑स्तरीय घोषणाएँ ‘स्थिरता’ की गलीचों से भ्रमित होती हैं, तो सतही शांति‑संकेत व्यावहारिक समाधान नहीं बन पाते। भारत जैसे देशों के लिए यह एक दोधारी तलवार है— एक ओर रूस के साथ ऊर्जा‑संबंधों की जटिलता, तो दूसरी ओर यूक्रेन के प्रति लोकतांत्रिक समर्थन का दायित्व। इस बीच, शांति‑अनुसंधान की दवाओं के बिना, केवल काग़ज़ पर लिखी गई शांति ही निरर्थक रहती है।

Published: May 5, 2026