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यमन में ईंधन की कीमतों में उछाल, सड़क यात्रियों को धकेल रहा आर्थिक दुविधा
यमन में ईंधन की कीमतों में इस साल के शुरुआती महीनों में हुए उछाल ने सड़क परिवहन पर सीधा असर डाला है। अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में उतार‑चढ़ाव, ओपेक‑प्लस द्वारा उत्पादन कटौती और लाल सागर में निरंतर सुरक्षा समस्याओं के कारण आयातित पेट्रोलियम की कीमत में 30‑35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस बढ़ोतरी को यमन के सुदूर‑आधारित सरकारों ने सुदूर‑सुविधा के आह्वान के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बजट में ‘संकल्पित सुधार’ के बहाने पेश किया है।
देश की सड़कों पर काम करने वाले लगभग 1.2 मिलियन टैक्सी और माइक्रो‑बस चालक, जो पहले से ही चलन‑फ्लुएंस वाले अरबियों की तुलना में कम आय पर काम करते थे, अब अपनी उपभोक्ता क्षमता को बचाने के लिए किराए 20‑25 प्रतिशत बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि “हालांकि ईंधन के बिल बढ़े हैं, पर सरकार की ओर से कोई नई सब्सिडी नहीं आई, इसलिए हमें अपने ग्राहकों को वही बोझ उठाना पड़ेगा।”
यमन के भीतर आर्थिक दबाव का असर केवल स्थानीय यात्रियों तक सीमित नहीं है। दक्षिण‑एशिया के कई श्रमिक, विशेषकर भारतीय और बांग्लादेशी, जो एड्रियन बंदरगाह के निकट के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करते हैं, वह अब अपने दैनिक यात्रा खर्च में दो‑तीन गुना अधिक जोड़ना पड़ रहा है। इससे उन्हें अपनी टिकटों पर अतिरिक्त पैसा खर्च करना पड़ रहा है, जबकि उनकी मूल वेतन में अभी भी युद्ध‑के‑बाद की मंदी के कारण कमी है। भारत-यमन व्यापारिक चैनलों के लिए यह एक अज़रन‑सिर के समान स्थिति बन गई है; जहाज़ों पर लदा माल महँगा पड़ रहा है और अंततः भारतीय आयातकों को अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ रही है।
न्यायिक रूप से देखा जाए तो इस नीति‑उपक्रम के पीछे सरकार का सूक्ष्म‑संतुलन दिखाई देता है: अंतरराष्ट्रीय दाताओं और आईएमएफ की “सदस्य‑शर्तों” के तहत सब्सिडी को धीरे‑धीरे हटाने की मंशा है, जबकि घरेलू जनमत को “आर्थिक सुधार” के मुखौटे में प्रस्तुत किया जाता है। वास्तविकता यह है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि के साथ ही सड़कों पर ट्रैफ़िक जाम और दुर्घटनाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, परन्तु इस पर कोई ठोस नियामक कदम नहीं उठाया गया।
इसी बीच, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ चल रहे “जीवन‑रेखा” समझौतों में ईंधन की आपूर्ति को स्थिर रखने की प्रतिज्ञा अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है। औपचारिक समझौते की रोटी थके‑थके नज़रें या फिज़ूल सरकारी बयान बनकर रह गई हैं—एक ओर कहा जाता है “आर्थिक विविधीकरण” और दूसरी ओर टैक्सी चालक की थैली से निकलता “सरकारी जाँच‑पड़ताल” बेमिसाल दिखता है।
संक्षेप में, ईंधन की कीमतों में वृद्धि ने यमन के सड़कों पर आर्थिक असमानता को धारा‑भरी तेज़ी से बढ़ा दिया है। जहाँ चालक अपनी जीविका बचाने के लिए किराया बढ़ा रहे हैं, वही यात्रियों को यह झेलना पड़ रहा है कि ‘आधुनिकता’ के नाम पर उन्हें अपने दैनिक खर्चों का वजन दो‑तीन गुना बढ़ाना पड़ेगा। इस असंतुलन को यदि तत्काल‑तीव्र नीति‑समीक्षा और लक्षित सब्सिडी राहत के साथ नहीं सुधारा गया, तो न केवल यातायात‑क्षेत्र बल्कि संपूर्ण आर्थिक पुनरुद्धार के रास्ते पर बड़े‑बड़े थैराफ़ी झटके लगते रहेंगे।
Published: May 8, 2026