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माली में सशस्त्र समूहों के हमले के एक हफ्ते बाद राष्ट्रपति असिमी गोइटा ने रक्षा मंत्री का पद संभाला

जाने 27 अप्रैल को उत्तर-पूर्वी माली के बहारी क्षेत्र में चल रहे विद्रोहियों ने एक बड़े हमले में ब्रिगेडों को ध्वस्त कर दो-तीन सौ सैनिकों को मार दिया। यह वही क्षेत्र है जहाँ पिछले साल फ्रांसीसी बलों का प्रस्थान हुआ और संयुक्त राष्ट्र की शांति-भाड़ा (MINUSMA) भी अपने अंतिम मिशन की तैयारी में है। घातक हमले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सरकार में हलचल शुरू हो गई।

इस हलचल का सबसे प्रमुख कदम तब आया जब मिलान के सैन्य शासन के नेता, राष्ट्रपति असिमी गोइटा ने बिना कोई औपचारिक घोषणा किए, खुद को रक्षा मंत्री घोषित कर लिया। आधिकारिक तौर पर यह एक ‘अस्थायी पुनर्गठन’ कहकर बताया गया, पर असली इरादा शायद यह था कि ‘सुरक्षा’ शब्द को एक ही व्यक्ति के पास केंद्रित करके जवाबदेही में कोई उलझन न रहे।

गोइटा का यह कदम कई तरह से दर्शाता है कि मिलानी सेना अभी भी अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए वैधता की खजाने में रेत पर भरोसा कर रही है। सैन्य कूटनीति के इस ‘सिंगल-टास्किंग’ के तहत, वह न केवल आंतरिक सुरक्षा की देखरेख करेगा, बल्कि बाहरी सहायक शक्ति – चाहे वह फ्रांस, यूरोपीय संघ या रूस हो – के साथ रणनीतिक वार्तालाप भी संभालेगा। इससे पहले कई बार ECOWAS और संयुक्त राष्ट्र ने मिलानी सरकार को ‘सहजता’ की चेतावनी दी थी; अब वह चेतावनी को ‘उदासीन’ में बदलने की कोशिश कर रहा है।

क्षेत्रीय प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। माली की अस्थिरता से पड़ोसी बुर्किना फासो, नाइजर और अल्जीरिया पर भी प्रतिध्वनि पड़ती है, विशेषकर तब जब मिलानी सीमा के पार इस्लामी जिहादियों के झुंडों को प्रोत्साहन मिलता है। अफ्रीकी यूनियन ने ‘अफ्रीकन सटेलेइट फोर्स’ की तैनाती का प्रस्ताव रखा है, पर वह भी गोइटा के ‘रक्षा मंत्री ही सब कुछ है’ के बयान के सामने कांप रहा है।

भारत के लिए इस घटना का सीधा असर दो पहलुओं में दिखता है। पहला, माली में कई भारतीय गोल्ड माइनिंग कंपनियां कार्यरत हैं; सुरक्षा की गिरावट उनके निवेश को जोखिम में डाल सकती है। दूसरा, भारत की अंतरराष्ट्रीय शांति-भेदी प्रतिबद्धताओं के तहत, अगर UN के मिलान मिशन का विस्तार हुआ तो भारतीय सैनिकों को पुनः तैनात करने की संभावना है। इसलिए, नई मिलानी रक्षा नीति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा रहा, भले ही न्यू दिल्ली अभी तक कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं कर रहा।

सार में, असिमी गोइटा की ‘स्वयं रक्षा मंत्री’ घोषणा एक नयी राजनीतिक रणनीति है – वह चाहता है कि शत्रु सशस्त्र समूहों को यह लगे कि अब कोई बहस नहीं, सिर्फ ‘कमांडो‑इन‑चीफ’ है। लेकिन डिप्लोमैटिक शब्दों में कहें तो, शक्ति‑संरचनाओं की इस पुनरावृत्ति में policies‑announcement‑vs‑ground‑reality का अंतर अक्सर बड़ी ही “व्यावहारिक” रूप से दिखता है। इस ‘एक‑पद‑केंद्रित’ मॉडल की सफलता या विफलता का आँकलन अभी बाकी है, पर निश्चित है कि माली के लोगों के लिए यह एक और दौर का ‘सुरक्षा‑समीकरण’ बन गया है।

Published: May 5, 2026