माली तानाशाह ने खुद को रक्षा मंत्री घोषित किया, पूर्व मंत्री की हत्या से बढ़ा सुरक्षा संकट
बेरचैन पश्चिम अफ्रीका में नया मोड़ देखेगा: मिलान के दो साल पुराने सैन्य तानाशाह असिमी गोटी ने अपने आप को रक्षा मंत्री की पदवी देकर सत्ता के एक और कोने पर कब्ज़ा जमाया। यह कदम उसी दिन आया जब पूर्व रक्षा मंत्री सादियो कामारा को मिलावटी जिहादी‑सेपरेटिस्ट गठबंधन द्वारा एक भयंकर हमले में मार दिया गया।
कामारा की मौत केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि इस बात का चेतावनी संकेत है कि जंता‑शासित मिलान की सुरक्षा व्यवस्था धीरे‑धीरे ‘अधूरा’ हो रही है। 2020‑2021 के दो राष्ट्रीय तख्तापलटों के बाद, गोटी ने खुद को “राष्ट्राध्यक्ष” कहा, पर अब वह सरकार के सबसे संवेदनशील विभाग—रक्षा—को भी अपने हाथ में ले रहा है, जिससे मिलान के राजनीतिक संस्थानों के अंतर में गहरी दरारें बन रही हैं।
जिहादी समूह, जो पहले मुख्यतः अल‑कायदा‑संलग्न अंसार कोरिंट गुट और ISIS‑शीखा नाँजरी समितियों के अंतर्गत संकलित थे, अब स्थानीय अलगाववादी संगठनों के साथ मिलकर एक बड़े पैमाने पर आक्रमण की योजना बुन रहे हैं। यह गठबंधन मिलान के उत्तर‑पूर्वी क्षेत्रों में, जहाँ सोने और लिथियम जैसी कच्ची सामग्री की खनन कंपनियों की वार्षिक आयकर्षक है, एक ‘सुरक्षा लुट’ के रूप में कार्य कर रहा है।
वैश्विक संदर्भ में, मिलान की अस्थिरता ने कई पश्चिमी देशों, विशेष रूप से फ्रांस और यूरोपीय संघ के लिए दोहरी दुविधा पैदा कर दी है। फ्रांस ने 2023 में अपनी मिलान‑आधारित सैन्य ऑपरेशन ‘बैराक’ को समाप्त कर दिया, जबकि यूरोपीय संघ ने सुरक्षा सहायता को घटाया, मूलतः ‘रक्षात्मक अनुबंध’ से ‘रद्दीकरण’ की दिशा में। इससे मिलान के राष्ट्रपतियों के पास अब कम अंतर्राष्ट्रीय समर्थन और अधिक आंतरिक दबाव है—एक ऐसी परिस्थिति जहाँ “खुद को रक्षा मंत्री बनाकर” गोटी ने ‘सुरक्षा के असली जवाबदेही’ को अपने ही हाथों में ले लिया।
भारत के दृष्टिकोण से देखे तो, जब कोई लोकतांत्रिक राष्ट्र, जो अंतर्राष्ट्रीय मंच पर शांति एवं विकास का समर्थन करता है, अपने सबसे संवेदनशील मंत्रालय को केंद्रीय सत्ता में एकत्रित कर लेता है, तो यह भारत के कई रणनीतिक हितों—जैसे सोने की खनन कंपनियों के निवेश, अफ्रीकी शांति-रक्षा योगदान, और क्षेत्रीय मानवीय सहायता—को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है। भारतीय कंपनियों को सुरक्षा जोखिमों के कारण अपनी परियोजनाओं को पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है, जबकि भारत‑अफ़्रीका पैरामिलिट्री सहयोग की योजना में भी गड़बड़ी आ सकती है।
सत्ता‑संरचनात्मक विश्लेषण स्पष्ट है: गोटी का यह कदम सैन्य अधिकार को बुनियादी नागरिक नियंत्रण से दूर ले जाता है, जिससे निरंकुश शासन की संभावना बढ़ती है। नीति‑घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर यहाँ उजागर होता है—जोहिंदी‑सेपरेटिस्ट हमलों के बीच “राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने” का एलबम बनता दिख रहा है, परन्तु वास्तविकता में वह केवल सत्ता को एकीकृत करने का नया हथियार बन गया है। इस प्रकार मिलान की त्रासदी, अनिवार्य रूप से, लोकतंत्र‑आधारित देशों के लिए एक चेतावनी बनकर सामने आती है: अस्थिर शासन में सुरक्षा का अभाव, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का पतन, और आर्थिक अवसरों का क्षीणन‑—बिल्कुल उसी क्रम में, जैसा कि कई अन्य अफ्रीकी राष्ट्रों में देखा गया।
Published: May 5, 2026