भारत ने यूएई पर हमले की निंदा की, त्रिपक्षीय तनाव में इरान‑इज़राइल युद्ध की पृष्ठभूमि
5 मई, 2026 को Washington में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने "प्रोजेक्ट फ्रीडम" नामक एक सैन्य‑आर्थिक मिशन शुरू किया, जिसका उद्देश्य स्ट्रेट ऑफ़ होरमुझ को पूर्णरूपेण नौवहन योग्य बनाकर तेल की आपूर्ति को फिर से सुगम करना था। औपचारिक दृष्टिकोण से यह पहल अंतर्राष्ट्रीय जल-मार्ग की सुरक्षा पर केंद्रित थी, पर इसकी घोषणा के साथ ही इरान ने दो‑तरफ़ा प्रतिक्रिया देना प्रारंभ कर दिया।
इरान ने इस अमेरिकी कदम को अपने रणनीतिक हितों के विरुद्ध मानते हुए, दुबई के पास स्थित संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में कई मिसाइल प्रहार किए। इन हमलों में त्रिपक्षीय टकराव—अमेरिका, इज़राइल और इरान—के जटिल जाल को और भी घना कर दिया, जबकि यूएई के शहरी बुनियादी ढाँचे को क्षति पहुंची। इस दंगे में तीन भारतीय नागरिक घायल हो गए, जिससे नई दिल्ली को तुरंत इस संकट में खींचा गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत एक बयान जारी कर यूएई में हुए हमलों की निंदा की और सभी पक्षों से तत्काल शांति एवं अनावश्यक नागरिक हताहतों से बचने का आग्रह किया। मोदी सरकार ने यह स्पष्ट किया कि भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा है, और उसके बाद व्यापक मध्य‑पूर्व स्थिरता। इस प्रवचन में भारत ने यूएई के प्रति अपने मित्रत्व को दोहराते हुए, इरान के साथ भी वार्ता के द्वार खोलने की इच्छा जताई।
यह घटना अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में एक प्रमुख परिवर्तन को दर्शाती है। ट्रम्प की "प्रोजेक्ट फ्रीडम" देखिए—एक रणनीति जो तेल के भंडार को खोलने के लिए सैन्य बल को हलचल में लाती है, जबकि परिप्रेक्ष्य में यह वही पुरानी शक्ति‑परिचालन है, जो दो दशक पहले भी इराक और अफगानिस्तान में देखी गयी थी। इरान ने इस रणनीति को अपने राष्ट्रीय संकल्प के रूप में मौखिक रूप से नहीं, बल्कि मिसाइलों के ज़रिए जवाब दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मध्य‑पूर्व में सैन्य‑औद्योगिक जटिलता अब भी अस्थिर है।
इज़राइल‑इरान युद्ध, जिसे कई विश्लेषकों ने "इज़राइल के अस्तर पर इरान की रेखा" कहा है, अब सिर्फ क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता नहीं रह गई; यह वैश्विक ऊर्जा बाजार, शिपिंग मार्ग एवं बड़े‑पैमाने पर गठबंधन को भी प्रभावित कर रही है। यूएई पर हुए हमले से तेल की कीमतों में त्वरित उछाल आया, और यूरोपीय देशों ने अपनी रणनीतिक तेल आपूर्ति को विविधता देने की ओर कदम बढ़ाया। भारत, जो पेट्रोलियम आयात में यूएई पर काफी निर्भर है, इसपर नज़र रखेगा और संभवतः वैकल्पिक स्रोतों की खोज तेज करेगा—एक कदम जो विश्व स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा के पुनः-स्वरुपीकरण को तेज़ कर सकता है।
संक्षेप में, ट्रम्प का प्रोजेक्ट, इरान की प्रतिक्रिया, और भारत का निष्कपट लेकिन सख़्त संतुलन—तीनों मिलकर यह दर्शाते हैं कि 2026 में भी बड़े‑देशों के नीति‑घोषणाओं और उनके वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर बहुत छोटा नहीं है। भारत की त्वरित कूटनीतिक प्रतिक्रिया, जबकि वह किसी भी पक्ष में सीधे नहीं पड़ता, उसके वैश्विक रणनीतिक हितों की परिपक्वता को उजागर करती है—किसी भी समय, जब भी एक नागरिक को चोट लगती है, तो दिल्ली का मुँह बंद नहीं रहता।
Published: May 5, 2026