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ब्रिटेन में बहु‑मुखी राजनैतिक युग का उदय, पुरानी मतगणना व्यवस्था अब जाँच में

ब्रिटेन की पारंपरिक दो‑पक्षीय राजनीति के अंत से अब एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। 2024‑25 के आम चुनावों ने दो‑मुख्य दल‑—कनज़रवेटिव पार्टी और लेबर पार्टी—की ही नहीं, संपूर्ण मतदान‑प्रणाली की भी परीक्षा ली। फर्स्ट‑पास्त‑द‑पोस्ट (FPTP) प्रणाली, जो जब बनायी गयी थी तो दो‑पक्षीय संतुलन को स्थायी बनाना था, अब छोटे‑छोटे लेकिन ज़ोरदार नए प्रतिद्वंद्वियों के कारण ‘कंटूर’ में उलझी हुई दिखती है।

वास्तव में, लिबरल डेमोक्रेट्स, ग्रीन पार्टी, स्कॉटिश नेशनल पार्टी, और हाल के ‘रिफॉर्म यूके’ जैसी आकृतियों ने पार्लमेंट में अपने‑अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सीटें मिलीं। परिणामस्वरूप, कोई भी दल अकेले सत्तारूढ़ नहीं हो सका, और एक फटे‑फटे गठबंधन की प्रक्रिया शुरू हो गई। आज तक के सबसे लंबे गठबंधन वार्तालापों में से एक चल रही है, जिसमें हर पक्ष यह दावा कर रहा है कि उसके बिना सरकार का ‘भ्रष्ट’ होगा, जबकि पीछे से देखी जाने वाली वास्तविकता यह है कि गठबंधन की अस्थिरता ही नीति‑निर्माण को अडिग बनाती है।

इस “गंदगी” के बीच, संसद के भीतर चुनाव सुधार की आवाज़ें भी तेज़ हो रही हैं। चुनाव आयोग ने कई बार प्रपोर्शनल रेप्रेजेंटेशन (PR) मॉडल की संभावना को उजागर किया है, परंतु स्थापित पार्टियों ने इस बदलाव को ‘वोट‑वेस्टिंग’ का खतरा बताया है। उनका तर्क है कि FPTP ने न केवल स्थिर बहुमत प्रदान किया, बल्कि छोटे‑छोटे क्षेत्रों की आवाज़ों को भी ‘सुनवाई’ दिलाई—एक व्यंग्यात्मक सच्चाई, जब छोटे‑छोटे क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की ही तो संख्या बहुत कम है।

भौगोलिक स्तर पर देखी जाए तो यह परिवर्तन वैश्विक स्तर पर भी अनदेखी नहीं है। यू.एस. में स्वतंत्र उम्मीदवारों का प्रोफ़ाइल उभर रहा है, फ्रांस में मध्य‑धारा के दल‑जैसे रेंगुशनीय पार्टियों की संख्या बढ़ी है, और ऑस्ट्रेलिया में समानुपातिक प्रतिनिधित्व ने पहले ही ‘छोटे‑छोटे दलों की आवाज़’ को प्रमुख बनाया है। ब्रिटेन की स्थिति अब इस बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक पुनर्संरचना का छोटा, पर अत्यंत विवादास्पद हिस्सा बन गई है।

नीति‑परिणाम स्पष्ट हैं। जलवायु परिवर्तन से लेकर रक्षा खर्च, और ब्रेक्सिट के बाद के व्यापार समझौतों तक कई प्रमुख एजेंडे पर स्पष्ट मतभेद उत्पन्न हो रहे हैं। गठबंधन वार्तालापों में अब ‘आधारभूत’ विषयों को ‘बहु‑पक्षीय समझौता’ के रूप में पैकेज किया जाता है, जिससे प्रत्येक सरकार के कार्यकाल का प्रभावी समय घटता ही जा रहा है। भारत के पाठकों के लिये यह एक परिचित दृश्य है: हमारे कई केंद्र‑राज्य गठबंधनों की तरह, यहाँ भी ‘क्या‑होगा‑यदि‑वॉट‑जॉब‑मॉल’ सर्कस चलता रहता है, परन्तु इस बार दर्शक कौन—मतदाता, राजनैतिक दल, या नीति‑निर्धारक—अस्पष्ट है।

अंततः, ब्रिटेन का यह चिरकालिक ‘पहला‑पास्त‑द‑पोस्ट’ प्रयोग अब एक ‘आख़िरी परीक्षण’ की कगार पर खड़ा है। यदि सुधार नहीं किए गये, तो मतदाता का ‘वेस्टेड वोट’ केवल बैलेट पेपर पर ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वैधता पर भी लक्षणीय रूप से असर डालेगा। और जैसा कि राजनीतिक अनालिस्ट अक्सर सफ़ेद‑काले मोनोटोन को नापसंद करते हैं, ब्रिटिश संसद की यह नई बहु‑पक्षीय कलाकृति भी अपने रंग‑रूप में अराजकता—और शायद, अंततः, एक सच्ची प्रतिनिधित्व‑क्रांति—को छुपाए हुए है।

Published: May 9, 2026