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Category: दुनिया

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ब्रिटेन में चीन के लिये जासूसी करने वाले दो पुरुषों को दी दोषसिद्धि

लंदन में एक विशेष अदालत ने दो भारतीय मूल के पुरुषों को चीन के लिये जासूसी करने का दोषी पाया। दोनों को 2024 में गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने यूके में रहने वाले हांगकांग के लोकतांत्रिक कार्यकारियों की निगरानी की थी।

आरोप लगाते हुए ब्रिटिश सुरक्षा एजेंसियों ने बताया कि आरोपी इकाई ने प्रवासी समूहों के घरों की लाइट, फोन कॉल और सामाजिक मीडिया प्रोफाइल का ट्रैक रखा, ताकि बीजिंग को उनके आवाज़ को दमन करने की रणनीति तैयार की जा सके। यह मामला, जो खुद को “हांगकांग रेज़िस्टेंस‑स्पायिंग” कहा गया, केवल एक जासूसी प्रकरण नहीं, बल्कि विदेश नीति और सुरक्षा के दोहरे मानकों का खुला नाट्य है।

दोषीकरण से पहले, जाँच में दिखा कि दोनों ने चीन के विदेशी सूचना एजेंटों को सीधे रिपोर्ट किया और फिएट‑फेनोमेनन की तरह पैसा कमाते हुए ‘डेटा‑ड्रॉप’ स्थापित किया। यह स्पष्ट करता है कि बीजिंग की जासूसी नेटवर्क अब सिर्फ सियोल या टोक्यो में सीमित नहीं, बल्कि यूरोप के लोकतांत्रिक निचले स्तर तक फैल गई है।

हांगकांग के प्रर्वासियों के बीच इस निर्णय ने ठंडा माहौल पैदा कर दिया। कई प्रवासी, जो 2020 के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के बाद यूके में शरण ले चुके थे, अब अपने सामाजिक संपर्कों के बारे में सतर्क हो रहे हैं। इस भय का असर न केवल निजी जीवन पर, बल्कि यूके की लोकतांत्रिक बहुपर्यायीता के मंच पर भी पड़ रहा है – जहाँ एक अभिव्यक्ति की सीमा को अब खुफिया एजेंसियों द्वारा तय किया जा रहा है।

इसी बीच, भारत की स्थिति जटिल बन गई है। भारतीय मूल के ये दो आरोपी, भारतीय विदेश मंत्रालय के लिये एक कुप्रसिद्धी का कारण बन सकते हैं, जबकि भारतीय सरकार आधिकारिक तौर पर चीन‑भारत दोनों के बीच बढ़ती जासूसी‑स्पर्धा को लेकर सतर्क रहती है। भारत में कई हांगकांग‑डेमोक्रेटिक प्रवासी भी बसे हैं, और उनका सुरक्षित रहना नई बौद्धिक‑राजनीतिक गठजोड़ों की नींव है। इस संदर्भ में, भारत को न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए, बल्कि यूके जैसी लोकतांत्रिक लोकतंत्रों के साथ मिलकर बहुपक्षीय निगरानी तंत्र भी बनाना चाहिए, ताकि चीन के ‘मसूड़े कोच’ को रोक सकें।

ब्रिटेन की सरकार ने इस दोषसिद्धि के बाद मौलिक सुरक्षा नीति में परिवर्तन का वादा किया है, पर इस वादे और वास्तविक कार्य के बीच का अंतर अक्सर ‘बड़ाई‑परिचर्चा’ से कम नहीं होता। यदि कूटनीतिक विरोधाभासों के बीच सच्ची पारदर्शिता नहीं दिखायी गई, तो यह निर्णय सिर्फ एक और ‘सजावटी सीख’ बन कर रह जाएगा, जो भविष्य में समान जासूसी प्रयासों को रोकने में असमर्थ रहेगा।

Published: May 8, 2026