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Category: दुनिया

ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों ने प्रो‑फिलिस्तीन छात्रों की निगरानी के लिए निजी फर्म को दिया अनुबंध

इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष के बाद से ब्रिटेन के कैंपसों में प्रो‑फिलिस्तीन प्रदर्शन तेज़ हो गई है। इस माह के मध्य में, कई प्रमुख यूके विश्वविद्यालयों ने एक निजी निगरानी कंपनी को छात्र आंदोलन की छानबीन के लिये अनुबंधित किया, जैसा कि हालिया रिपोर्ट में सामने आया। कंपनी को दी गई जिम्मेदारी में सामाजिक‑मीडिया प्रोफ़ाइल, समूह गतिविधियों और कैंपस प्रोटेस्ट के संभावित व्यवधानों की पहचान शामिल है।

संकल्पना मूलतः “समुदाय सुरक्षा” के नाम से प्रस्तुत की गई, परंतु आलोचकों का कहना है कि यह कदम अभिव्यक्तिशीलता की बुनियादी स्वतंत्रता को चीरने का प्रयास है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने तर्क दिया कि असंतोषपूर्ण कार्यकलापों से छात्रों की सुरक्षा और शैक्षणिक अनुष्ठान दुविधा में पड़ सकते हैं, जबकि वही निगरानी प्रणाली सामाजिक‑राजनीतिक अभिव्यक्ति को दबी करने की ओर इशारा करती है।

विदेशी छात्रों के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील है। भारत के कई विश्वविद्यालयों में भी हाल ही में विदेश‑संबंधी, पर्यावरणीय या सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता देखी जा रही है, और भारतीय छात्रों ने अक्सर विदेश में भी समान “सुरक्षा‑निगरानी” के बारे में चिंता जताई है। यदि ब्रिटेन में ऐसी प्रथा स्थापित हो गई, तो भारतीय छात्र संभावित रूप से अपनी अभिव्यक्ति पर बंधन महसूस कर सकते हैं, जिससे यूके में भारतीय शैक्षणिक प्रवाह में गिरावट की संभावना बढ़ सकती है।

वैश्विक संदर्भ में, यह कदम यूरोप के अन्य देशों की समान पहलों से मेल खाता है, जहाँ विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के दबाव में निजी डेटा‑एनालिटिक्स फर्मों के साथ जोड़ना आम हो रहा है। हालांकि, यूके की यह पहल “साइबर‑सुरक्षा” के नाम पर व्यक्तिगत गोपनीयता के उल्लंघन से लेकर “शैक्षिक स्वायत्तता” के ध्वंस तक कई कानूनी और नैतिक प्रश्न उठाती है।

नीति‑परिणाम की बात करें तो, जरूरतमंद छात्रों के संघों ने तत्काल अनुबंध की समाप्ति की मांग की है और यह मुद्दा संसद के मानवाधिकार समिति के एजेंडा में पहुँच चुका है। यदि उच्च न्यायालय इसे संवैधानिक उल्लंघन मानता है, तो कई विश्वविद्यालयों को अपने निगरानी प्रोटोकॉल को पुन: विचार करना पड़ेगा।

ड्राई विट के साथ कहा जाए तो, विश्वविद्यालयों के यह प्रयास नाट्यात्मक रूप से “जटिलता को सरल बनाना” के लक्ष्य को पूरा करता है—छात्रों को सतह पर स्वतंत्रता मिलती है, पर पीछे से डेटा‑कैम्प में धँसाने की कोशिश। इस बिंदु पर, भारतीय शिक्षा संस्थानों को सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि दुनियाभर में शैक्षणिक स्वतंत्रता की सीमाएँ धीरे‑धीरे “सुरक्षा‑परिदृश्य” की छत्रछाया में धुंधली होती जा रही हैं।

Published: May 5, 2026