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बीथलेहम में फ़िलिस्तीन मैराथन की वापसी, हजारों धावकों ने भाग लिया
गाज़ा युद्ध के बाद दो साल के अंतराल को तोड़ते हुए, फिलिस्तीन मैराथन ने 8 मई 2026 को बीथलेहम में फिर से ध्वज फहराए। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अनुमानित पाँच‑हज़ार धावकों ने इस कार्यक्रम में भागीदारी की, जिसमें स्थानीय फ़िलिस्तीनियों, मध्य‑पूर्वी पड़ोसी देशों और विदेशियों का मिश्रण दिखा।
2024‑2025 में गाज़ा के उठते संघर्ष ने न केवल मानवीय स्थिति को बिखेर दिया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय खेल‑इवेंट्स को भी बाधित कर दिया। इस दौरान कई शहरी क्षेत्रों में व्यवधान और सुरक्षा‑संकट ने बीथलेहम के वार्षिक मैराथन को रद्द कर दिया था। अब इस आयोजन की पुनरावृत्ति को पुनर्स्थापना के प्रतीक के साथ-साथ सॉफ्ट पावर की छलांग माना जा रहा है, जहाँ फ़िलिस्तीनी अधिकारियों ने "शांति की दौड़" को प्रमोट करने की कोशिश की।
राजनीतिक रूप से देखें तो इस मैराथन को इज़राइल‑फ़िलिस्तीन संघर्ष के संदर्भ में एक सूक्ष्म संदेश के रूप में पढ़ा जा सकता है। पश्चिमी सरकारों के औपचारिक बयान अक्सर मानवीय हड़तालों का जिक्र करते हैं, परन्तु खेल‑ईवेंट की अनुमति देना अक्सर अस्थायी स्थिरता का भ्रम पैदा करता है। इस प्रकार, अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों की नीतियों में परिलक्षित "कार्यवाही‑और‑वाद‑के बीच का फासला" स्पष्ट रूप से दिखता है।
भारतीय पाठकों के लिए इस मैराथन की प्रासंगिकता दो स्तरों पर उभरती है। एक ओर, भारत ने औपचारिक तौर पर दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाये रखने और निरस्त्रीकरण की अपील में निरन्तरता दिखाई है। दूसरी ओर, भारतीय एथलीटों की भागीदारी और भारत‑फ़िलिस्तीन मित्रता संघों की उपस्थिति इस कार्यक्रम को भारत की विदेश नीति के सॉफ़्ट‑डिप्लोमेसी के साधन के रूप में दिखाती है। कई भारतीय पर्यटन एजेंसियों ने नेड़े के आसपास के धार्मिक स्थल देखे बिना इस मैराथन को ही यात्रा पैकेज का केंद्र बना दिया है।
सार के तौर पर, बीथलेहम में पुनः शुरू हुआ फ़िलिस्तीन मैराथन न केवल शारीरिक चुनौती है, बल्कि भू‑राजनीतिक प्रतिबिंब भी है। यह दर्शाता है कि संघर्ष‑ग्रस्त क्षेत्रों में भी सांस्कृतिक‑खेल आयोजनों को पुकारा जा सकता है, परन्तु वास्तविक सुधार के लिये केवल धावकों के कदमों से अधिक गहरी कूटनीतिक दृढ़ता और मानवीय सहयोग की आवश्यकता होगी।
Published: May 9, 2026