बाढ़ में बहा व्यापारी, कूगर‑भरे नदी में खोज ने दिखाया पुलिस की असहायिता
पिछले हफ़्ते तेज़ बाढ़ के बाद एक स्थानीय व्यापारी के लापता होने की खबर ने उन क्षेत्रों में राहत‑कार्य की तत्परता पर सवाल उठाए, जहाँ कूगरों का कब्ज़ा आधे नदी में ही है। पुलिस ने आज एक अधिकारी को रेस्क्यू बोट से नहीं, बल्कि एक दोहाइ के डोरी से घटाकर कूगर‑भरे जल में उतारा, ताकि एक संभवतः बाढ़‑से धकेले गए शरीर की हड्डियों को निकाल सकें।
आरोपित शारीरिक अवशेषों को अभी तक पहचान नहीं मिली, पर स्थानीय पुलिस मानते हैं कि यह वही व्यवसायी हो सकते हैं जिसे पिछले हफ़्ते बाढ़ ने विस्थापित किया था। अब तक इस तरह की जलवायु‑प्रेरित आपदा प्रतिक्रिया में सीधे पुलिस का दायित्व रखना असामान्य है; आम तौर पर ऐसी स्थितियों में जल बचाव दल, विशेषज्ञ डाइवर्स या वन्यजीव व वन्यशास्त्रियों की टीम को बुलाया जाता है।
वहीं, भारत में भी बाढ़‑ग्रस्त क्षेत्रों में अक्सर पुलिस को बचाव कार्य में उतारा जाता है, जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य‑स्तर की जल बचाव एजेंसियों की कमी को लेकर वर्षों से आलोचना हो रही है। भारत की कुछ राज्य सरकारें, जैसे उत्तराखंड और बिहार, जहाँ बाढ़ की आवृत्ति बढ़ रही है, अभी भी पर्याप्त बचाव उपकरण और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी के कारण “पुलिस को कूगर‑नदी में उतारना” जैसी ही स्थिति का सामना कर रही हैं।
इस घटना ने वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन द्वारा उत्पन्न नई चुनौतियों को उजागर किया है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु मंचों में कई देशों ने बाढ़‑प्रबंधन के लिए बजट बढ़ाने का वादा किया है, पर वास्तविकता में अक्सर नीति बयानों और व्यावहारिक कार्यों में अंतर दिखता है। यहाँ तक कि कूगर‑संकट वाले क्षेत्रों में समुचित वन्यजीव प्रबंधन योजनाएँ भी नहीं बन पाई हैं, जिससे बचाव दल के कर्मियों को जीवन‑संकट के साथ सदैव संघर्ष करना पड़ता है।
आलोचक कहते हैं, “जब बजट दस्तावेज़ों में जलवायु‑प्रभावित क्षेत्रों के लिये विशेष निधि आवंटित की जाती है, तो भी जमीन पर कूगर‑भरे जल में डूबते पुलिस वाले ही दिखते हैं।” यह संकेत देता है कि नीति‑निर्धारकों और कार्यान्वयन करने वाले एजेंसियों के बीच एक निरंतर अंतर है, जो अक्सर जनता को जोखिम में डालता है।
जांच के बाद यदि यह शरीर ही उस व्यवसायी का पाया जाता है, तो यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी बल्कि वह्य में निहित उत्तरदायित्व की गंभीर अनुचितता को भी दर्शाएगी—जैसे कि “संकट में कूगरों को भी माफ़ी‑परिचय” की स्याही से लिखे गए नियम।
भविष्य में, बाढ़‑प्रवण क्षेत्रों में कूगर‑संकट को नज़रअंदाज़ करके केवल “पुलिस को नीचे उतारें” पर भरोसा करना, नीति‑प्रकाशनों की निरर्थकता को और भी स्पष्ट कर देगा। जलवायु‑परिणामी आपदाओं के जवाब में सच्ची तैयारी का अर्थ है न केवल वित्तीय आवंटन, बल्कि सक्षम बचाव‑तकनीक, प्रशिक्षित दल और वन्यजीव‑प्रबंधन की समेकित नीति—वह सब जो इस बार कूगर‑भरे जल में एक पुलिस अधिकारी को नीले कपड़े में डुबोने से नहीं बचा।
Published: May 3, 2026