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Category: दुनिया

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पश्चिम बंगाल में चुनावी उथल‑पुथल में बीजेपी नेता के सहायक की मौत, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल चिह्न

पश्चिम बंगाल के मध्य‑पूर्वी भाग में 2 मई को समाप्त हुए विधानसभा चुनाव के दो हफ्ते बाद, सुबेंदु अधीर (Suvendu Adhikari) के निजी सहायक चंद्रनाथ राथ की गुप्तहाथ हत्या ने प्रदेश की राजनीति को फिर एक नया तनाव‑बिंदु दे दिया। राथ को 7 मे, रात लगभग 22:30 बजे, कोलकाता‑सुबরियाका राजमार्ग पर रात्रिकालीन गश्त के दौरान गोली मारकर मार दिया गया।

राथ, जो अधीर के मुख्य रणनीतिक सलाहकार और चुनाव‑परिणाम‑आधारिक टीम में प्रमुख था, की हत्या का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है। स्थानीय पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज किया, लेकिन शुरुआती जाँच ने दो संदेहियों को नामांकित किया – एक स्थानीय ‘मुसाविदा’ समूह और दूसरा विरोधी दल के समर्थक, दोनों ही राजनीतिक हिंसा की छाया में अक्सर झोप रहे हैं।

यह घटना केवल एक गुप्तहाथ हत्या नहीं, बल्कि चुनाव‑परिणाम के तुरंत बाद सुरक्षा बुनियादी ढाँचे की चूक को भी उजागरती है। सामान्यत: चुनावी माहौल में ‘शांतिपूर्ण परिवर्तन’ की घोषणा के साथ, कई राज्यों में पुलिस कर्मी वर्ग को ‘शिक्षा‑उत्पादक’ माना जाता है – जिसका अर्थ है कि वे मतदाता‑सुरक्षा को कोई तीव्रता नहीं देते। इस प्रकार, ‘गश्त’ शब्द का प्रयोग जैसे “गश्त की हल्की हवा” की तरह ठहर जाता है।

बिहार‑उत्पादित (BJP) के प्रमुख नेता सुबेंदु अधीर, जो त्रिपुरी में अस्थायी मुख्यमंत्री पद के लिये प्रयत्नशील हैं, ने इस हत्या को “राजनीतिक असहिष्णुता” के साथ जोड़ते हुए केंद्रीय सरकार को कड़ा फोकस रखने का आह्वान किया। वहीं, राज्य की सर्वोच्च शक्ति में रहने वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के मुखिया ममता बनर्जी ने कहा कि “हथियारों की आवाज़ से लोकतंत्र का स्वर नहीं जुड़ता” और प्रदेश में ‘विवाद‑समाधान’ की माँग की।

आंतरिक सुरक्षा नीति के दृष्टिकोण से, यह घटना केंद्र और राज्य के बीच दो मुख्य अंतर को उजागर करती है: एक, चुनाव‑परिणाम के बाद त्वरित ‘कंट्रोल‑ऑपरेशन’ की कमी; दूसरा, विभिन्न स्तरों पर ‘सैन्य‑उत्पादक’ बनाम ‘नागरिक‑उत्पादक’ पुलिस संरचना का असंतुलन। कम्यूनिकेशन में गृह मंत्रालय द्वारा अक्सर कहा जाता है कि “सुरक्षा व्यवस्था को राजनीतिक माहौल से अलग किया जाएगा,” पर वास्तविकता में, यह अलगाव अक्सर ‘राजनीतिक धूम्रपान’ के नीचे ही रहता है।

परिणामस्वरूप, इस हत्याकांड ने शहरी उपनगरों में तनाव को फिर से भड़काया है और छोटे‑कौमी गांवों में भी ‘स्व-रक्षा’ के सिरे पर कई नागरिक समूहों को सक्रिय किया है। भारतीय जनता के बीच यह भावना उभर रही है कि यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बाद भी ‘गोलियों का शोर’ गूंज रहा है, तो चुनावी सुधार केवल कागज़ पर ही रह जाएंगे। अंत में, यह घटना एक निहितार्थी चेतावनी बन गई है: राजनीतिक शक्ति का प्रयोग यदि सुरक्षा तंत्र के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, तो लोकतंत्र की नींव पर धुंधला असर पड़ेगा।

Published: May 7, 2026