पश्चिम एशिया के संघर्ष ने उजागर किया भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियाँ
गुज़रते महीनों में मध्य‑पूर्व में तलवारबाजी ने केवल भू‑राजनीतिक भू‑चित्र को ही नहीं, बल्कि विश्व ऊर्जा बाजार की नाजुक धागों को भी खींचा है। भारत, जो अपनी 85 % से अधिक कच्चे तेल की माँग विदेशों से पूरा करता है, इस झटके को सीधे अपने घरेलू अर्थव्यवस्था में महसूस कर रहा है।
आज तक की सबसे बड़ी धक्का 15 मई को शुरू हुए इस संघर्ष से आया, जब प्रमुख निर्यातक देशों में उत्पादन सुविधाओं पर खतरा मंडराने लगा, जिससे तिलकित दरें क्षणिक रूप से 10 % तक बढ़ गईं। इस अवधि में भारत का तेल आयात लागत लगभग ₹ 13 हजार प्रति बैरल तक पहुँच गया, जिससे डीलरों को वैकल्पिक ईंधन पर धक्का मिला और उपभोक्ताओं को अंततः बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ा।
विदेशी नीति के अनुसार, भारत ने हमेशा “वैकल्पिकता” को प्रमुख रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया है – कई देशों से अनुबंध, विभिन्न शिपिंग रूट और टैंकर‑आधारित स्टोरेज का विस्तार। यह बहु‑स्रोत्री दृष्टिकोण निश्चित रूप से लाभदायक है, परन्तु यहाँ एक उल्लेखनीय विरोधाभास छुपा है। जबकि सरकार के बयानों में “स्व-निर्भरता” का झूमर बजता है, वास्तविकता में वह पेट्रोलियम उत्पादन में 0.2 % से कम हिस्सेदारी रखता है। यह दुहाई नीतियों के बीच की दूरी को उजागर करती है, जहाँ ‘विकल्प’ शब्द का प्रयोग अक्सर ‘आशावाद’ के रूप में किया जाता है, न कि ठोस कार्य‑योजना के रूप में।
वैश्विक संदर्भ में देखें तो, पश्चिम एशिया के तनाव के साथ ही यूरोप और चीन दोनों ने अपने-अपने ऊर्जा स्फीति के उपायों को तेज किया है। यूरोपीय संघ ने नवीकरणीय ऊर्जा के प्रतिस्थापन में हाइड्रोजन को प्राथमिकता दी, जबकि चीन ने सहेज‑संचित कोयला भंडारण को पुनर्जीवित किया। भारत की स्थिति विशेष रूप से चौंकाने वाली है, क्योंकि यह भी अपने जलवायु लक्ष्य (2030 तक कार्बन तीव्रता 45% घटाना) और आर्थिक वृद्धि (2026 में 6 % बुनियादी) के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
नीति‑परिणामों की बात करें तो, तत्कालिक उपायों में रिफाइनरी के इन्फ्रास्ट्रक्चर को तेज़ी से अपडेट करना और रणनीतिक तेल भंडार को दो‑तीन बार बढ़ाना शामिल है। लेकिन इससे भी अधिक जरूरी है, राज्य‑उद्यमों में ‘पारदर्शिता’ और ‘जवाबदेही’ की संस्कृति को स्थापित करना। मौजूदा पेट्रोलियम मंत्रालय की रिपोर्टें अक्सर “उच्च‑स्तरीय समीक्षा” का उल्लेख करती हैं, परन्तु अनिवार्य सार्वजनिक सुनवाई या हितधारक सहभागिता को नहीं। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में धुंधला पड़ाव है, जिसका प्रभाव न केवल नीति के कार्यान्वयन पर, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ता है।
सारांश में, पश्चिम एशिया के संघर्ष ने भारत को एक कठोर सबक दिया: ऊर्जा सुरक्षा का अभिप्राय केवल कच्चे तेल की मात्रा नहीं, बल्कि विकल्पों के विकल्पों की गहराई में निहित है। बिना सुस्पष्ट नियोजन के विविध आपूर्ति श्रृंखला, जहाँ अनिश्चितता को ‘विकल्प’ कहा जाता है, वह सिर्फ धुंधला कवच ही रहेगा। आने वाले वर्षों में यदि सरकार जलवायु लक्ष्यों को सतत आर्थिक वृद्धि से संतुलित करने में संकोच नहीं दिखाती, तो न केवल पेट्रोल पंप, बल्कि राष्ट्रीय विश्वास भी कीमत चुकाएगा।
Published: May 6, 2026