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Category: दुनिया

पूर्व अमेरिकी जासूस जोनाथन पोलार्ड ने गाज़ा के जनसंहार की वकालत की, केनसेट में सीधा चुनाव लड़ेंगे

जोनाथन पोलार्ड, जो 1990 के दशक में अमेरिकी नौसेना ख़ुफ़िया ठेके के तहत इज़राइल को सैन्य रहस्य बेचने के कारण 30 साल तक जेल में रहे, ने इस वर्ष इज़राइल की संसद (केनसेट) के लिए चुनाव लड़ने का एलान किया।

इंटरव्यू में चैनल 13 को दिए अपने बयान में पोलार्ड ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं व्यक्तिगत रूप से गाज़ा के सभी वर्तमान निवासियों को बलपूर्वक हटाने और उस क्षेत्र को इज़राइली आबादी से पुनः बसाने के पक्ष में हूँ।” यह टिप्पणी न केवल अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के विरोध में है, बल्कि इज़राइल की मौजूदा ‘अन्नेक्सीशन’ नीतियों को भी खुलेआम समर्थन देती है।

पोलार्ड की यह स्थिति कई स्तरों पर सवालों को जन्म देती है। सबसे पहले, वह अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी में 30 साल की सजा सहे चुके हैं, जिसका मतलब है कि उन्होंने अपने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम में डाल दिया था। अब वही व्यक्ति इज़राइली राजनीति में प्रवेश कर अपने शत्रु‑देशी‑विरोधी विचारों को वैध बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसी “रूपांतरण” न केवल अमेरिकी रक्षा‑सुरक्षा संस्थानों की निगरानी में चूक दर्शाती है, बल्कि इज़राइल के भीतर घुलते‑मिलते राष्ट्रवादी तत्वों की सशक्तता का भी संकेत देती है।

गाज़ा में जारी संघर्ष के पृष्ठभूमि को समझते हुए भारत के लिए यह घटना विशेष महत्व रखती है। भारतीय विदेश नीति की मूलभूत सिद्धांत नॉन‑इंटरवेंशन (अहस्तक्षेप) और मानवीय अधिकारों की रक्षा है। हालाँकि, मध्य पूर्व में बढ़ते तलवारबाज़ी के कारण भारतीय कंपनियों की ऊर्जा‑सुरक्षा और भारतीय समुदायों की प्रवासी सुरक्षा पर असर पड़ता है। पोलार्ड की बयानों को भारत में देखे जाने वाले शरणार्थी नीति‑परिवर्तनों के साथ जोड़ना आवश्यक है—कि कैसे ‘कठोर’ रुख वास्तविक में शरणार्थियों के लिए बढ़ती असुरक्षा बनाता है।

भौगोलिक‑राजनीतिक रूप में, इस तरह के बयान अमेरिका‑इज़राइल गठबंधन की मौजूदा असंतुलन को उजागर करते हैं। अमेरिकियों की जासूसी के लिए दंडित “स्ट्रेच‑डॉगर” की अगली भूमिका को इज़राइल में वैधता देना, इस गठबंधन के नैतिक आयाम को धुंधला करता है। साथ ही, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक बयानों में लगातार दोहराए जा रहे “गाज़ा के लोगों के अधिकारों का सम्मान” की तालिकाओं को इस प्रकार के “नजरिये” से जोड़ना किसी भी मौजूदा कूटनीतिक रचनाओं को बेकार कर देता है।

नीति‑घोषणाओं और वास्तविकताओं के बीच का अंतर यहाँ स्पष्ट हो जाता है। जबकि इज़राइल की सरकार आधिकारिक तौर पर “सुरक्षा” की वकालत करती है, पोलार्ड जैसे व्यक्तियों की उभरी आवाज़ें यह दर्शाती हैं कि “सुरक्षा” की सीमाएँ अक्सर मानवीय अधिकारों को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। अंततः, यदि पोलार्ड के जैसे व्यक्तियों को केनसेट में सीट मिलती है, तो यह इज़राइल के भीतर सामुदायिक‑राष्ट्रीयवाद के उभार को और अधिक सुदृढ़ करेगा, जिससे शांति‑वार्ता की संभावनाएँ और घटेंगी।

सारांश में, एक पूर्व अमेरिकी जासूस का इज़राइली संसद में ‘जनसंहार’ का समर्थन, न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध है, बल्कि वैश्विक कूटनीति के उन मौलिक सिद्धांतों को भी चुनौती देता है, जिनपर भारत सहित कई देशों ने अपनी बाहरी नीतियों को आधार दिया है। यह कहानी इस बात का बुरा उदाहरण है कि कैसे खतरनाक विचारधाराएँ, जब अधिकारिक मंच पर पहुँचती हैं, तो न केवल क्षेत्रीय स्थिरता, बल्कि विश्व स्तरीय मानवीय मानदंड भी खतरे में पड़ते हैं।

Published: May 6, 2026