न्यू साउथ वेल्स में छुपे GPS ट्रैकिंग को अपराध मानते हुए नई विधायी पहल
ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी राज्य न्यू साउथ वेल्स (NSW) ने गुप्त GPS ट्रैकिंग डिवाइस को अपराध की श्रेणी में डालने वाला कानून पारित किया। यह कदम एक विस्तृत रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें यह उजागर किया गया कि घरेलू हिंसा (DV) के कई आरोपी स्वार्थपूर्वक ऐसे उपकरण खरीद रहे थे, जिससे महिलाओं की निजता और सुरक्षा पर नया जोखिम उत्पन्न हो रहा था।
राज्य के प्रमुख क्रिस मिन्स ने कहा, "प्रौद्योगिकी को महिलाओं के विरुद्ध हथियार बनाया गया है, और हमारे क़ानून इस प्रवृत्ति के साथ नहीं चल पाए हैं।" उनका यह बयान सामयिक ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही बहस का हिस्सा है, जहाँ यूरोप, संयुक्त राज्य और यहाँ तक कि भारत जैसे देशों में भी स्थान‑डेटा के दुरुपयोग पर सख़्त नियमन की माँग की जा रही है।
रिपोर्ट में उल्लेखित एक केस ने विधायी बदलाव को तीव्र बना दिया: 25‑वर्षीय वैवाहिक बंधन के बाद, एक स्थानीय पुरुष ने ऑटो पार्ट्स की दुकान से GPS ट्रैकर खरीदा, अपनी पत्नी की हर चाल को मॉनिटर किया और अंततः विवाह टूटने के बाद उसे गोली मार कर आत्महत्या कर ली। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि तकनीक के दुष्प्रयोग की सामाजिक चुनौतियों का स्पष्ट संकेत थी।
नया कानून, जिसका आधिकारिक नाम खोज‑और‑ट्रैकिंग (गुप्त) (विद्युत्-आपराधिक) विधेयक 2026 है, अब बिना सहमति के GPS ट्रैकर का अधिग्रहण, स्थापना या उपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति को अधिकतम पाँच साल की जेल या ₹15 लाख जुर्माने की सज़ा तय करता है। इस विधेयक के साथ ही पुलिस को जल्द‑से‑जल्द ट्रैकिंग डिवाइस की पहचान करने और हटाने के लिये तकनीकी सहायता प्रदान करने का अधिकार भी दिया गया है।
वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो इस कदम को अक्सर देर से आए सुधार के रूप में सराहा जाएगा। संयुक्त राज्य में 2022‑2023 में कई राज्यों ने समान क़ानून लागू किए, जबकि यूरोपीय संघ ने 2024 में "स्थान‑डेटा संरक्षण" पर व्यापक दिशा‑निर्देश जारी किए। भारत में 2023‑24 में पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल (PDPB) की चर्चाएँ चल रही हैं, जहाँ कुछ विधायकों ने "विवाह‑सम्बन्धी नियंत्रण" को प्रतिबंधित करने की माँग की थी, परंतु अभी तक कोई विशेष प्रावधान नहीं बना है।
क़ानून के प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों में आशावाद और सतर्कता दोनों ही मौजूद हैं। एक समाजशास्त्री ने टिप्पणी की, "क़ानून बनाना तो कदम है, पर उसका कार्यान्वयन, निगरानी और न्यायिक परिप्रेक्ष्य ही वास्तविक परिवर्तन लाएगा।" वहीं एक तकनीकी विश्लेषक ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा, "आखिरकार यह राज्य स्वीकार कर रहा है कि गाड़ी के पार्ट्स की दुकान से खरीदा गया छोटा GPS भी अब हत्या के उपकरण की श्रेणी में आ गया है—इसे क्या कहेंगे, ‘ड्राइवर‑लेस कार’ की ही तरह 'ड्राइवर‑लेस हिंसा'?
भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो यह पहलक़दम हमारे देश में चालू महिलाओं के सुरक्षा प्रावधानों के साथ मिलकर एक सुदृढ़ ढांचा तैयार कर सकता है। भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में अक्सर डिजिटल सबूतों की कमी से अभियोग कमजोर पड़ता है। यदि यह क़ानून ऐसा एक मॉडल बन जाता है, तो भारतीय न्यायपालिका को भी अपने वैधता‑जाँच मापदंडों को पुनः परिभाषित करना पड़ेगा—ख़ासकर जब मोबाइल‑एप‑आधारित ट्रैकिंग समाधान आम हो रहे हैं।
अंत में, यह कहना व्यर्थ नहीं होगा कि तकनीकी नवाचार ने चुनौतियों की नई कतार पेश की है, परन्तु लागू नीति‑निर्माण में देरी अब आगे तक नहीं चलेगी। NSW का यह कदम एक चेतावनी है: चाहे वह क्लाउड‑डेटा सेंटर्स हों या गली‑कोने की छोटी दुकानें, सभी को अब महिलाओं की सुरक्षा को हथियार बनाने की अनुमति नहीं होगी। समय-समय पर क़ानून का ‘अँधेरा’ और ‘रोशनी’ का संतुलन बनाना ही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
Published: May 4, 2026