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Category: दुनिया

न्यू साउथ वेल्स पुलिस ने ज्यू नागरिक को एंटी‑सेमिटिक धमकी के केस छोड़ने को प्रेरित किया, रॉयल कमिशन में गवाही

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स (NSW) में रहने वाले ज्यू उद्यमी निर गोलान ने 5 मई 2026 को असेंबली के उपमहाप्रभारी वैर्जीनिया बेल को सुनवाई में बताया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें इस बात के लिए समझौता करने को कहा कि वह एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एंटी‑सेमिटिक अपमान, मृत्यु धमकी और सार्वजनिक रूप से नाज़ी सलाम करने के आरोप को छोड़ दे। पुलिस ने बताया कि “इसमें ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता और अंततः केस फेंक दिया जाएगा” – एक बयान जो ‘जाँच‑सही‑पहले’ सिद्धांत के सिवाय कुछ तो नहीं।

गोलान ने बताया कि जिस व्यक्ति ने उन्हें यह सब सिखा दिया, वह न केवल सार्वजनिक स्थान में नाज़ी चिन्ह दिखा रहा था, बल्कि सोशल मीडिया पर घृणा भरे शब्द भी इस्तेमाल कर रहा था। यह घटना 2024 में शुरू हुई और कई बार रिपोर्ट की गई, परंतु NSW पुलिस की प्रतिक्रिया “यही है, हमने पहले ही देख लिया है, इसे छोड़ दो” रही।

रॉयल कमिशन ने इस पर गहरी जांच का आदेश दिया, क्योंकि यह मामला केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक‑राजनीतिक प्रश्न को उठाता है: क्या एंटी‑सेमिटिक हिंसा के खिलाफ मौजूदा कानूनी ढांचा वास्तव में काम करता है, या फिर यह सिर्फ कागज़ पर ही मौजूद है? कमिशन ने पुलिस के “ब्यूरोक्रेटिक उदासीनता” को “अंतहीन जाँच‑कोशिश” के रूप में आलोचना की, जो अक्सर पीड़ित को निराशा के कगार पर लाता है।

इस घटना को देख कर भारत में भी समान मुद्दे सामने आते हैं। हाल ही में कई राज्यों में कम्युनिटी‑विशेष के खिलाफ सामाजिक मीडिया पर घृणा के मामले सामने आए हैं, परंतु अक्सर पुलिस “प्राथमिकता नहीं” का तर्क दहराती है। यहाँ तक कि स्थानीय अधिकारियों को भी “पूरी तरह से जाँच नहीं की जा सकती” कहकर मामलों को बंद कर दिया जाता है। निर गोलान की गवाही से यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी लोकतंत्रों में भी यह समस्या व्याप्त है – और यह उन देशों के लिए चेतावनी है जो बहु-सांस्कृतिक समाज में समान न्याय की आशा रखते हैं।

आधिकारिक तौर पर, NSW सरकार ने इस सप्ताह बाद में कहा कि “बधिर आवाज़ों को सुनना हमारे कार्य का पहला कर्तव्य है” और “पर्याप्त संसाधन जुटाए जाएंगे”। लेकिन वास्तविकता में, पुलिस की असहयोगी रवैया इस बात को दर्शाता है कि नीतियों का निर्माण अक्सर कार्रवाई से दूर रहता है।

रॉयल कमिशन ने इस मामले से सीख लेकर एक नई “एंटी‑सेमिटिक हिंसा प्रोटोकॉल” बनाने की योजना की ओर इशारा किया है। यदि यह प्रोटोकॉल प्रभावी रूप से लागू किया गया, तो भारत जैसे बहु-धार्मिक देशों को भी इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है, ताकि किसी भी जनसमुदाय को “विचार‑भेद” के कारण न्याय से वंचित न करना पड़े।

Published: May 5, 2026