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Category: दुनिया

न्यू साउथ वेल्स की संसद पूछताछ में गवाहों ने अदालत के फैसले के बाद मुकदमेबाज़ी का साहसिक कदम

न्यू साउथ वेल्स (एनएसडब्ल्यू) के व्यापक सार्वजनिक हित जांचों को अब नए मोड़ का सामना करना पड़ रहा है। राज्य के सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर में पार्लियामेंटरी इविडेंस एक्ट के कुछ प्रावधानों—जो अभियोक्ता वारंट जारी करने का अधिकार देते थे—को निरस्त कर दिया, यह तर्क देते हुए कि वह न्यायालय की संस्थागत अखंडता को कमजोर करता है। फिर भी, ठीक उसी दिन, राज्य सरकार के प्रमुख, मुख्यमंत्री क्रिस मिन्स के प्रमुख स्टाफ ने अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए मोशन दायर किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस समस्या का असर केवल एक मामले तक सीमित नहीं है।

न्यायालय के फैसले के बाद, कई गवाहों ने स्पष्ट रूप से संसद के समक्ष हाज़िर होने से इनकार कर दिया। उनका तर्क है कि अब उन्हें आपराधिक बंधक या गिरफ्तारी का खतरा नहीं है, इसलिए वे बिना बाध्यकारी आदेश के सुने जाने के हकदार हैं। यह “पूरी तरह अस्वीकार्य” कदम, जैसा कि आलोचक कहते हैं, सार्वजनिक हित जांचों के भरोसे को घटा रहा है।

ऐसे परिदृश्य में कोई हवाला दोहराए बिना नहीं रह सकता कि भारत में भी संसद वाणिज्यिक और सामाजिक मुद्दों की जांच में गवाहों को आपराधिक आदेशों से बाध्य किया गया है। जबकि भारतीय अभियोजन प्रक्रिया में संसद की जांच कार्रवाइयों को अक्सर संरक्षण दिया जाता है, यहाँ भी समान प्रोटोकॉल के विरुद्ध ध्वनि करने की संभावनाएँ प्रकट हो रही हैं। दोनों देशों के बीच संस्थागत जांच की स्वायत्तता पर इस प्रकार के कदम का प्रतिध्वनि असंगत दिखता है, जहाँ एक ओर लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग है और दूसरी ओर न्यायालयीय संरक्षण के नाम पर ‘आइडियल’ अभिज्ञात प्रवृत्ति है।

न्यू साउथ वेल्स की इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सूखा व्यंग्य का प्रयोग किया जा सकता है: “जब न्यायालय खुद को बचाने के लिये विधायी शक्ति को सीमित करता है, तो विधायी आयोग अपने कार्य में खुद को बाधित कर लेता है।” इसका मतलब है कि सत्ता के तीन स्तंभ—नीति, न्याय और विधायन—के बीच का संतुलन अब घटते हुए शक्ति-संदर्भ में परख जा रहा है।

राज्य सरकार ने अभी तक इस प्रतिक्रिया पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गवाहों की अनुपस्थिति बनी रहती है, तो भविष्य में अधिक कठोर कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं, जिससे लोकतांत्रिक जवाबदेही की धारणा और अधिक संकुचित हो सकती है। इस बीच, भारतीय नीति निर्माताओं के लिए यह एक अवसर भी है कि वे अपने लोकतांत्रिक तंत्र में इस तरह की “अधिकार-व्यापी” परिस्थितियों को रोकने के लिए स्पष्ट प्रक्रियात्मक मार्गदर्शन तैयार करें।

Published: May 5, 2026