न्यू मैक्सिको की न्यायालय में मेटा ऐप्स पर दोशीरी जांच: बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े नियमों की मांग
संयुक्त राज्य के न्यू मैक्सिको राज्य में चल रहे मेटा (पूर्व में फेसबुक) के ऊपर मुकदमे के दूसरे चरण में प्रॉसिक्यूटर्स ने न्यायाधीश से एक विस्तृत आदेश माँगा है, जो प्लेटफ़ॉर्म की लत लगने वाली सुविधाओं को काबू में लाने, उम्र की जाँच को कड़ाई से लागू करने और डिफ़ॉल्ट प्राइवेसी सेटिंग्स के जरिए बाल यौन शोषण को रोकने के उद्देश्य से है।
विचाराधीन उपायों में अनंत स्क्रॉल, ऑटो‑प्ले और व्यक्तिगत विज्ञापन एल्गोरिदम की सीमा निर्धारित करना, यूज़र आयु सत्यापन के लिए बायो‑मेट्रिक या दस्तावेज‑आधारित प्रणाली अपनाना, और सभी नाबालिग खातों को स्वचालित रूप से निजी मोड में रखना शामिल है। अभियोजन पक्ष का तर्क है कि इन कदमों से न केवल बच्चों की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि संभावित यौन शोषण की घटनाओं को भी रोकने में मदद मिलेगी।
संयुक्त राज्य में इस प्रकार की पहल अब निरंतर बढ़ रही है। कैलिफ़ोर्निया, टेक्सास और वर्जिनिया जैसे राज्यों ने भी समान कानून पेश किए हैं, जबकि फेडरल स्तर पर कांग्रेस में बड़े टेक कंपनियों पर नियामक दबाव बढ़ रहा है। मेटा ने कई बार लाबिंग फाइलें दाखिल की हैं, यह संकेत देते हुए कि अल्गोरिदम सिर्फ उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाते हैं, न कि मनकटी (addiction) के उपकरण। वास्तविकता में, कंपनियों ने अक्सर प्लैटफ़ॉर्म पर उपयोगकर्ता‑संतुष्टि को मापने के बजाय विज्ञापन राजस्व को प्राथमिकता दी है।
न्यायालय का आदेश कितना दूर तक पहुँचता है, यह अभी अनिश्चित है। न्यायाधीश को अब बाइनरी कोड के बजाय बाइनरी विकल्पों को समझाना पड़ेगा – यानी यह तय करना होगा कि कौन से एल्गोरिदम को “बच्चाओं‑पर‑ध्यान” मोड में बदलना है और कौन सी सुविधाएँ “बच्चे‑धोखा” बन रही हैं। इसके साथ ही, टेक लबियों को अक्सर “डेटा‑इंटरऑपरेबिलिटी” जैसे जटिल शब्दजाल में घेर लिया जाता है, जिससे वास्तविक उपायों की गति रुक जाती है।
भारत के लिए भी इस मुक़ाबले के संकेत गंभीर हैं। ट्रैइ (TRAI) और डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत सोशल मीडिया पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई चर्चा चल रही हैं, पर अभी तक कोई कठोर आयु‑सत्यापन प्रणाली लागू नहीं हुई है। अमेरिकी अदालतों में इस तरह के आदेशों का उत्पन्न प्रभाव भारतीय नियामकों को प्रेरित कर सकता है, विशेषकर उन प्लेटफ़ॉर्म्स के बारे में जो भारतीय यूज़र्स को भी लक्ष्य बनाते हैं।
अंततः, यदि न्यायाधीश इस प्रॉसिक्यूशन की मांगों को स्वीकार करता है तो मेटा को एक कठोर प्रीसेट सिस्टम लागू करना पड़ेगा, जो संभावित रूप से कंपनी के विज्ञापन मॉडल को सीमित कर सकता है। अन्य ओर, यदि अदालत केवल लघु बदलावों पर ही रुकती है, तो यह केस फिर भी एक चेतावनी रहेगा — बड़ी टेक कंपनियों को यह दिखाने के लिए कि निकट भविष्य में उनका “स्वैच्छिक” आत्म‑नियमन नहीं, बल्कि सरकारी आदेश ही उनका मुख्य दिशा‑निर्देश बन सकता है।
Published: May 4, 2026