नेपाल के राष्ट्रपति ने संवैधानिक परिषद अधिनियम जारी किया, बड़े पदों की भरपाई के लिए रास्ता खुला
काठमांडू के राष्ट्रपति ने 6 मई को एक विशेष विधेयक, जिसे संवैधानिक परिषद अधिनियम कहा गया, लागू किया। यह आदेश सरकार को संविधानिक निकायों में प्रमुख पदों की नियुक्ति करने की अनुमति देता है, जिसमें कई महीनों से खाली रह गया मुख्य न्यायाधीश (सीजे) का पद भी शामिल है।
विकल्पहीन और बाधित राजनीतिक माहौल ने इस खालीपन को कायम रखा था। संसद में गठबंधन कोषलियों के बीच असहमति और विपक्षी दलों की निरंतर विरोध ने उचित प्रक्रिया को धीमा कर दिया, जिससे न्यायपालिका के कामकाज में असर पड़ा। अब, राष्ट्रपति का यह कदम, औपचारिक विधायी बहस को बायपास कर, नियुक्तियों को तेज़ी से आगे बढ़ाने का इरादा दर्शाता है।
विचार करने योग्य है कि इस अधिनियम की लागू होने से लोकतांत्रिक सिद्धांतों की सीमाएँ कहाँ तक खिंचेंगी। पार्लियामेंटरी चर्चा को बायपास करने का तर्क अक्सर ‘राष्ट्र के हित में’ दिया जाता है, पर यह ही वह जगह है जहाँ संस्थागत जवाबदेही का परीक्षण होता है। यह स्पष्ट है कि कानूनी रूप से वैध होने के बावजूद, ऐसे आदेश की राजनीतिक वैधता अक्सर सवालों में रहती है।
भारत के साथ नेपाल के संबंधों पर इस कदम का प्रभाव भी अपरिहार्य है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, ऊर्जा, जल जलवायु और भौगोलिक सुरक्षा के मुद्दों पर नियमित संवाद चलता है। नेपाल की न्यायपालिका में स्थिरता और विश्वसनीयता, भारत के निवेश और द्विपक्षीय सहयोग के लिए आवश्यक तत्व हैं। यदि नई नियुक्तियां राजनीतिक संतुलन और पेशेवर योग्यता पर आधारित नहीं हों, तो भविष्य में उन दो पड़ोसी देशों के बीच कानूनी एवं आर्थिक विवादों की संभावना बढ़ सकती है।
संभावित दुष्प्रभावों के बीच, यह भी देखा जाना चाहिए कि नई संरचना कितनी हद तक कार्यकारी शक्ति को सुदृढ़ करेगी। संविधान के तहत स्थापित संवैधानिक परिषद का मूल उद्देश्य विभिन्न शाखाओं के बीच संतुलन बनाना था; अब यह देखना होगा कि यह संतुलन अस्थायी आदेश में बदल न जाए।
विवेचना के बाद भी, यह स्पष्ट है कि नेपाल में लंबे समय से जमे हुए शीर्ष पदों को भरना अनिवार्य था। क्या यह अधिनियम स्थायी समाधान प्रदान करेगा या केवल एक अल्पकालिक ज़रूरत के लिए त्वरित उपाय है, यही तो समय तय करेगा।
Published: May 6, 2026