नेपाल की नई सरकार पर सेना का दबदबा, लोकतांत्रिक स्थान सिकुड़ता
एक महीने पहले गठन वाली नेपाल की नई सत्ता‑बदलाव को लेकर शुरू से ही एक ही सवाल बना रहा – लोकतंत्र की जगह कोष्ठक में डाला जा रहा है या नहीं? प्रमुख शासक श्री शाह ने अपना मंत्र स्पष्ट किया है: “डिलीवरी और गति है हमारा लक्ष्य।” लेकिन इस गति का मापदण्ड किस दिशा में है, और किसके हित में, यह बात राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनो स्तरों पर सवाल पैदा कर रही है।
नई सरकार के गठन के बाद, सेना को सार्वजनिक जीवन में अतीत में न देखी गयी भूमिका मिल रही है। वरिष्ठ सैन्य कमांडरों को महत्वपूर्ण आर्थिक और विकास परियोजनाओं के संचालन में सीधे नियुक्त किया गया, जबकि नागरिक समाज संगठनों को अनुमति के जाल में फँसाया जा रहा है। उल्लेखनीय रूप से, पिछले दो हफ्तों में दो प्रमुख मानवाधिकार समूहों के कार्यालयों को बंद करने का आदेश मिला, और कई पत्रकारों को वैकल्पिक “प्रदर्शन” के रूप में “सरकारी प्रशिक्षण” में भाग लेने के लिये बाध्य किया गया।
इन उपायों को सरकार ने "अस्थिरता के विरुद्ध प्रगतिशील कदम" कहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि लोकतांत्रिक मानदण्डों की जाँच‑पड़ताल के लिये कोई स्वतंत्र संस्था अब नहीं बची। “उपलब्धि की ध्वनि में सभ्यता का बुड्ढा छिपा है” – यह शब्द, हालांकि थोड़ा व्यंग्यात्मक, उन नागरिकों की निराशा को बखूबी दर्शाते हैं जो लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को सख़्त नियंत्रण में महसूस करते हैं।
क्षेत्रीय दावेदारों की दृष्टि से यह विकास भारत के लिये एक चेतावनी संकेत बन जाता है। नेपाल, भारत का निकटतम पहाड़ी पड़ोसी, लंबे समय से भारत‑नेपाल मुक्त व्यापार, जल‑विद्युत और सीमा सुरक्षा के द्विपक्षीय समझौतों से जुड़ा रहा है। अब, जब सैन्य का हस्तक्षेप बढ़ रहा है, तो भारत को दो चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा: सुरक्षा जोखिमों की संभावित वृद्धि, और नेपाल के राजनीतिक झुकाव में संभावित बदलाव, विशेषकर अगर यह चीन के प्रतिपक्षी गठबंधन की ओर अधिक आकर्षित हो।
सत्ता के बयान और जमीन पर घटित वास्तविकता के बीच की दूरी पर एक पतली परत है। नई सरकार ने “निवेश‑प्रेरित विकास” और “शिक्षा‑सेवा के विस्तार” के वादे किए, परन्तु इन पहल के लिये नियामक ढाँचा अभी भी सैन्य रणनीति के अधीन है। उम्मीद है, अगर भारत इस बदलाव को संज्ञान में लेकर अपने राजनयिक और आर्थिक उपकरणों को उचित रूप से समायोजित नहीं करता, तो वह मात्र एक रणनीतिक सहयोजक नहीं रहेगा, बल्कि एक अप्रिय पड़ोसी बन सकता है।
इसलिए, जबकि शाही सरकार की गति तेज़ है, लोकतंत्र का रास्ता कहीं गीला‑गीला लगता है – एक ऐसी स्थिति जहाँ विकास की धूप में नागरिक अधिकारों की छाया कमज़ोर पड़ती दिख रही है।
Published: May 4, 2026