नेटान्याहू ने 119 बिलियन डॉलर के रक्षा निवेश की घोषणा की
इज़राइल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेटान्याहू ने 3 मई 2026 को यह घोषणा की कि देश अपने सैन्य तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए 119 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश करेगा। यह राशि, जो लगभग भारत के वार्षिक रक्षा बजट के दो‑तिहाई के बराबर है, इज़राइल को अपने हथियार प्रणालियों को पूरी तरह घरेलू स्तर पर विकसित करने के रस्ते पर ले जाएगी।
यह कदम कई कारणों से समझा जा रहा है। एक ओर, लंबे समय से चल रहा अमेरिकन सैन्य सहायता मॉडल बदल रहा है; वार्षिक अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती और अमेरिकी विदेश नीति में बदलाव ने इज़राइल को आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया है। दूसरी ओर, ईरान‑इज़राइल तनाव, लेबनान में हेझ्बोल्लाह की सक्रियता और सऊदी‑इज़राइल संबंधों में नई खुलासे, सभी मिलकर एक ऐसी रणनीतिक आवश्यकता उत्पन्न कर रहे हैं जिसमें विदेशी घटकों पर निर्भरता को कम किया जा सके।
सभी मौजूदा वाणिज्यिक और रक्षा कंपनियों के बीच यह नई धनराशि एक "सैन्य‑औद्योगिक सम्मिलन" के रूप में कार्य करेगी। असल में इसका मतलब है: राष्ट्रीय रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा अब अनुसंधान‑विकास (R&D) में जाएगा, जबकि निजी रक्षा फर्मों को दीर्घकालिक अनुबंध मिलेंगे। यहाँ पर छोटा‑सा व्यंग्य है—इज़राइल के सतत युद्ध‑परिप्रेक्ष्य के साथ, यह योजना शायद सरकार को "बिस्किट पर आधा"‑जैसा दिखावे की बजाय "बिजली के बिल पर सैकड़ों अरब" जैसी वित्तीय बोझ फेंक सकती है।
वैश्विक संदर्भ में देखें तो इस निवेश से पहले ही यूरोपीय संघ और यूएसए की रक्षा वित्तीय प्रतिबद्धताएं धीमी हुई हैं, और चीन तथा रूस अपने निर्यात‑रणनीतियों को तेज कर रहे हैं। इज़राइल की इस बड़ी धनराशि को आत्मनिर्भरता के जज्बे में बदले जाना, एशिया‑प्रशांत में तकनीकी खेप में अनजाने में एक नई प्रतिस्पर्धा को जन्म दे सकता है—विशेषकर उन देशों के साथ जिनकी सुरक्षा संबंधी जरूरतें समान हैं, जैसे भारत।
भारत‑इज़राइल रक्षा सहयोग पिछले दो दशकों में तेज़ी से बढ़ा है; ड्रोनों, कैटापुल्ट‑एयरक्राफ्ट और मिसाइल प्रणालियों के आयात में इज़राइल का प्रमुख हिस्सा है। अब जब इज़राइल दूरस्थ रूप से अपनी तकनीकी श्रृंखला को स्वदेशी बनाता है, तो भारतीय रक्षा प्रक्षेपण दल को दो चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। पहला, मूल्य वॉल्यूम में संभावित वृद्धि, क्योंकि स्वदेशी उत्पादन अक्सर शुरुआती चरण में महंगा होता है। दूसरा, तकनीकी साझेदारी में नई शर्तें—इज़राइल अपने उन्नत पेटेंट को निर्यात करने में अधिक सतर्क हो सकता है, जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय प्रतिपक्षियों के साथ देखा गया।
नीतिगत रूप से देखें तो यह घोषणा इज़राइल की स्वयं‑निर्भरता की ओर एक स्पष्ट संकेत है, परन्तु यह सवाल अभी भी बना रहता है कि यह कितना व्यावहारिक है। 119 बिलियन डॉलर की रकम को यदि दस‑वर्षीय योजना में बांटा जाए तो औसत वार्षिक खर्च लगभग 12 बिलियन रहेगा, जो किसी भी छोटे‑से‑मध्य‑आकार के छोटे‑देश के बजट से कहीं अधिक है। इस प्रकार की खर्चीली योजना किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में पारदर्शिता और निगरानी के प्रश्न उठाती है—क्या इज़राइल की संसद, केनेसैट, इस बड़े वित्तीय प्रोजेक्ट की सटीक बही‑खाते देख पाएगी, या यह केवल रक्षात्मक राजनेताओं के बियॉन्ड‑डिफेंस प्रजेंटेशन का हिस्सा रहेगा?
संक्षेप में, इज़राइल की $119 बिलियन की रक्षा निवेश घोषणा एक दोधारी तलवार है: यह राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने की आशा देती है, जबकि क्षेत्र में हथियार प्रतिस्पर्धा को तेज़ कर सकती है, और भारतीय रक्षा उद्योग के लिए नई चुनौतियाँ और अवसर दोनों लाएगी। जैसा कि इतिहास बार‑बार सिद्ध करता है, सीमित संसाधनों को बड़ी रणनीतिक लक्ष्य में बदलना अक्सर नीति‑निर्माताओं के “भविष्य‑वाणी” से अधिक “वित्तीय‑वास्तविकता” पर निर्भर करता है।
Published: May 3, 2026