नाइजीरिया‑बेनिन मिलिशिया ने फुलानी चरागाहियों पर सशस्त्र छापेमारी की, कई हत्याएँ
विक्टोरिया द्वीप से दूर, नाइजीरिया और बेनिन की सामुदायिक मिलिशिया ने पेशेवर सुरक्षा बलों के साथ मिलकर फुलानी चरागाहियों के गाँवों में ‘दरवाजा-दरवाजा’ ऑपरेशन किया। 3 मई 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जवान पुरुषों को अंसारु – अल‑कायदा‑संबद्ध उग्रवादी समूह – के सूचना दूत होने के संदेह में पकड़ा गया, और जो प्रतिरोध करते रहे उन्हें गोली मार दी गई।
नाइजीरिया की सुरक्षा एजेंसियों ने औपचारिक रूप से बताया कि ये कार्रवाई “अंतर्निहित आतंकवादियों को खत्म करने” के उद्देश्य से थी। बेनिन के स्थानीय सुरक्षा समूह, जो अक्सर वैध राज्य संरचना से बाहर कार्य करते हैं, ने इसी सिलसिले में भाग लिया। औपचारिक आदेशों की बजाय, “सुरक्षा” शब्द को अब गलियों‑गलियों की जाँच तक फैला दिया गया, जहाँ वसूली पर “संशयित” को बंधक बनाकर प्रतिरोध करने वाले को सीधे लक्ष्य बनाया जाता है।
इन घटनाओं का वैश्विक संदर्भ बेहद स्पष्ट है: सहरा‑सहारा बिस्तर में अल‑कायदा‑संबद्ध समूहों की सक्रियता पिछले दो दशकों में स्थिर नहीं, बल्कि पुनरुज्जीवित हो रही है। जलवायु‑परिवर्तन से उत्पन्न चरागाह‑ध्वंस, किसान‑पशुपालक संघर्ष और सीमापार आपराधिक नेटवर्क मिलिशिया को असामान्य अधिकार देते जा रहे हैं। इस बीच, पश्चिम अफ्रीका के कई देशों द्वारा “मानवाधिकार‑सहि सुरक्षा” का जाहीर करने के बावजूद, जमीन पर वही कुख्यात “उपरोधिक” नीति चल रही है।
नीति‑घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर स्पष्ट है। नाइजीरिया के राष्ट्रपति ने अभी‑ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर “शांति‑निर्माण” का आश्वासन दिया था, परंतु उनके रक्षा मंत्रालय के तहत ‘घर‑घर दौरा’ के दौरान नागरिक जीवन को मारना, इस आश्वासन का प्रतिकूल प्रमाण है। बेनिन में, जहाँ सरकार की मुख्यधारा पर थ्रेड‑बॉडी शैली की मिलिशियाओं को सशक्त किया जाता है, वहीं संयुक्त राष्ट्र की शांति‑रक्षा मिशन को भी अक्सर “सिस्टमिक उपयोग” का आरोप मिलता है।
भारत की दृष्टि से इस विकसित संकट का सीधा असर सीमित लगता है, फिर भी कई भारतीय कृषि कंपनियां वेस्ट अफ्रीका में निवेशित हैं, जहाँ फुलानी चरागाहियों पर भरोसा करके जमीनी सप्लाई चैन स्थापित किया गया है। इस तरह की सुरक्षा‑भारी लहरें सप्लाई‑चेन में बाधा डाल सकती हैं और भारतीय निर्यातकों के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकती हैं। साथ ही, भारतीय डाइस्पोरा, विशेषकर व्यापारियों और चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा भी सवालों के घेरे में है।
संकल्पना के तौर पर, “सुरक्षा” शब्द को अब ‘बख्शीश‑जोर’ की कहानी में बदल दिया गया है, जहाँ किसी भी प्रतिरोध को असहाय मान कर गोलीबारी का विकल्प नहीं छोड़ा जाता। यह स्पष्ट है कि अगर नाइजीरिया‑बेनिन सरकारें अपने “कानून‑और‑व्यवस्था” के दावे को विश्वसनीय रखना चाहती हैं, तो वे मानवाधिकार निकायों से सहयोग के बजाय, स्थानीय जमीनी जनसंख्या के बीच विश्वास का पुनर्निर्माण करना होगा – न कि उनका नरसंहार।
Published: May 3, 2026