‘द डिविल वीयर प्रादा 2’ ने महिला‑उन्मुख बॉक्स‑ऑफ़ शक्ति दिखाते हुए $233 मिलियन की शुरुआती कमाई हासिल की
उम्रदराज़ सितारा मेरियल स्ट्रिप ने फिर से अपनाई अपना क्लासिक भूमिका, और इस बार ‘द डिविल वीयर प्रादा 2’ ने अमेरिकी‑कनाडाई बॉक्स‑ऑफ़ पर $77 मिलियन, कुल मिलाकर $233 मिलियन (लगभग ₹19,000 करोड़) की कमाई कर दी। यह आंकड़ा न केवल सीज़न की सबसे ऊँची शुरुआत बन गया, बल्कि एक ऐसे समय में जब अधिकांश हिट सुपर‑हीरो फ्रैंचाइज़ी बहुसंख्यक पुरुष दर्शकों को टार्गेट कर रही थीं, महिला‑केन्द्रित फिल्म ने असाधारण सफलता दर्ज की।
वैश्विक स्तर पर इस सफलता का अर्थ सिर्फ़ एक शानदार किराए की चढ़ाई नहीं है। यह दर्शाता है कि हॉलीवुड का पारंपरिक “बड़े बजट, बड़े एक्सपो के साथ सीज़न को बचाओ” मॉडल अब बहु‑सांस्कृतिक और जेंडर‑सेंसिटिव कंटेंट की मांग से जुड़ रहा है। अमेरिकी सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा ग्रीन कार्ड वाले कलाकारों की संख्या बढ़ाने और विदेशियों को फिल्म निर्माण में भाग लेने पर अनुदान देने की नीति, इस बदलाव को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देती है, जबकि वास्तविक मुद्दा है दर्शकों की विविधता की मान्यता।
आगे देखते हुए, इस फिल्म की सफलता का परावर्तन भारतीय बाजार में भी स्पष्ट है। भारतीय दर्शक, खासकर महिलाएँ, अब नेटफ़्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर अधिक विविध कहानियों की माँग कर रहे हैं, जिससे बॉलीवुड में भी “फीमेल‑जेनर” प्रोजेक्ट्स की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है। सरकार द्वारा “फ़ॉरवर्ड फ़िल्म साक्षरता” अभियान के तहत छोटे शहरों में सिनेमाघर सुधार के साथ, ऐसी अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्मों का भारतीय बॉक्स‑ऑफ़ पर प्रभाव अधिकतम हो रहा है – जबकि बुनियादी ढाँचा और कर नीति अभी भी बड़े पैमाने पर विदेशी स्टूडियो को आकर्षित करने के लिए पुरानी गिरिजा‑क्रिया में फँसी हुई हैं।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो “मैलिक” जैसा संगीत जीवनी (जो दूसरे हफ़्ते में $54 मिलियन कमाया, केवल 44% गिरावट के साथ) को पुनः बौद्धिक रूप से “कंपनी” की तरह स्थिर रखना, ‘प्रादा’ के साथ उछाल का संकेत देता है कि ऐसा नहीं कि “बॉक्स‑ऑफ़ केवल एक नंबर है”; इसके पीछे मौद्रिक नीति, विज्ञापन शुल्क, और कई बार टैक्टिकल को‑ऑर्डिनेशन के बीच की दूरी पर एक विशाल संस्थागत चक्रव्यूह है।
पारियोंफ़िक ज़रुरत के माध्यम से Hollywood का “फीमेल‑फ़्रेंडली” ट्रैक अब एक वास्तविक ब्रांड एसेट बन चुका है, लेकिन यह भी उतना ही नटखट है जितना दिल्ली के मेट्रो में नयी रूट का उद्घाटन – जाँच‑परख, सुगम‑सुविधा, फिर भी ऊँचा टैरिफ। आज जब व्यावसायिक योजनाएँ इस बात पर भरोसा करती हैं कि “फीमेल‑इक्विटी” बॉक्स‑ऑफ़ के आंकड़े को पुष्टि करेगी, तो नीति‑निर्माता और बड़े स्टूडियो दोनों को अब अपने‑अपने “वित्त‑शॉर्टकट” को पुनः मूल्यांकित करना पड़ेगा।
Published: May 4, 2026