तीसरी लगातार दर वृद्धि से घर का सपना और धुंधला, भारतीय प्रथम खरीदारों पर बढ़ता बोझ
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने इस वर्ष में पहले ही दो बार नीति दर बढ़ाने के बाद तीसरी बार दर वृद्धि की घोषणा की। यह क्रमिक उदारीकरण न केवल मौजूदा बंधकधारकों को झकझोर रहा है, बल्कि उन नवप्रवेशियों के लिए भी घर‑खरीद का लक्ष्य लगभग असम्भव बना रहा है, जो अपने पहले आश्रय की ओर कदम बढ़ा रहे थे।
दानी हंटरफ़ोर्ड और उनके पति जैसी जोड़े, जिन्होंने कई वर्षों से जमा राशि एकत्र कर अपनी पहली घर की रूपरेखा तैयार की थी, अब इस नई दर‑उच्ची के बाद अपने सपने को फिर से संशोधित करने के लिए मजबूर हैं। बैंकों की ऋण‑दर में वृद्धि के साथ, उधारी लागत में लगभग दो प्रतिशत की जबरन वृद्धि आई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में एंट्री‑लेवल प्रॉपर्टी की कीमतें साल‑दर‑साल 5‑6% तक बढ़ती जा रही हैं।
यह भारतीय रियल एस्टेट बाजार में वैश्विक मौद्रिक नीति के प्रभाव की एक स्पष्ट उदाहरण है। पिछले कई महीनों में अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व ने भी कई बार बेंचमार्क दर बढ़ाई, जिससे वैश्विक पूँजी प्रवाह कठोर हो गया। परिणामस्वरूप, उभरते बाजारों में उधार की लागत में सूक्ष्म वृद्धि देखी गई, और भारत के लिये यह परिप्रेक्ष्य बहुत अधिक महँगा सिद्ध हो रहा है।
नीतिगत तौर पर, RBI के इस कदम का मुख्य तर्क महंगाई नियंत्रण है, परन्तु इसमें एक दुविधा नज़र आती है: जबकि महंगाई को दमन करना आवश्यक है, समान समय में घोसित रूप से बढ़ती ब्याज दरें घरेलू उपभोक्ता खर्च को घटा देती हैं, विशेषकर आवासीय सेक्टर में। घर की कीमतों में निरन्तर वृद्धि के साथ, कम‑आय वर्ग की खरीद शक्ति घट रही है, जिससे प्रचुर मात्रा में किरायेदार उत्पन्न हो रहे हैं—एक ऐसा वर्ग जिसे सरकारी सस्ते आवास योजनाओं की भी अपर्याप्त पूर्ति मिलती है।
भारत की साजिश‑पूर्ण मध्यम वर्गीय आकांक्षा—‘घर अपना’—अब एक आर्थिक त्रिलोक बना रहा है। एक ओर ब्याज दरों का बढ़ना, दूसरी ओर प्रॉपर्टी की कीमतों में तेज़ी; मध्य‑वर्गीय घर‑खरीददारों को वर्जित वित्तीय समीकरण के दो घटक मिलते हैं। इस दुविधा को सुलझाने के लिये मौजूदा नीति‑निर्धारकों को दो‑सरलीकरण वाली रणनीति अपनानी होगी: या तो मूल्य‑नियंत्रण में सख्ती लाकर एंट्री‑लेवल प्रॉपर्टी को सुलभ बनाना होगा, या फिर आर्थिक विकास को तेज़ कर के आय‑वृद्धि को बढ़ावा देना होगा, जिससे ऋण‑भुगतान क्षमता में सुधार हो।
वर्तमान में, बाजार में दर्शनीय संकेत यह है कि कई प्रथम‑खरीदार बैंकों से उच्च‑व्यक्तिगत ऋण की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे फाइनेंशियल सेक्टर में बैंकरली जोखिम बढ़ रहा है। इस स्थिति को उपेक्षित करने पर, भविष्य में बैंकों को बकाया ऋण पर ‘नॉन‑परफॉर्मिंग एसेट्स’ (NPA) की बढ़ोतरी झेलनी पड़ सकती है, और अंततः आर्थिक वृद्धि पर बोझ बन सकता है।
संक्षेप में, RBI की लगातार दर‑वृद्धि ने भारतीय घर‑स्वामित्व के सपनों को अत्यंत नाजुक बना दिया है। यह नीति‑निर्धारण का एक कठिन संतुलन है—महंगाई को काबू में रखने के लिये उच्च दर, जबकि सामाजिक स्थिरता के लिये किफायती आवास की आवश्यकता। यदि यह असंतुलन जारी रहा, तो न केवल प्रथम‑खरीदारों की निराशा, बल्कि व्यापक आर्थिक प्रणाली में भी असंतोष की लहर दौड़ सकती है।
Published: May 5, 2026