तुर्कमेनिस्तान के ‘नरक के द्वार’ धुंधले होते, पर परिणाम अभी भी धुंध में
सुचीबद्ध उपग्रह चित्रों ने संकेत दिया है कि दशकों से जलते रह रहे तुर्कमेनिस्तान के गैस क्रेटर का जलना अब धीरे‑धीरे कम हो रहा है। लेकिन इस कमी के पर्यावरणीय पहलुओं को अभी भी समझा जाना बाकी है।
1971 में सोवियत संघ द्वारा किए गए गैस ड्रिलिंग के दौरान एक दुर्घटना ने कराहती हुई “दरवाज़ा‑इन्‑हेल” (Door to Hell) को जन्म दिया, जिसे अक्सर “नरक का द्वार” कहा जाता है। तब से यह 70 मीटर व्यास वाला क्रेटर निरंतर ज्वाला और गैस के धुएँ से प्रकाशित रहा, जिससे यह वैश्विक जलवायु पर एक विचित्र लेकिन सतत ग्रीनहाउस गैस स्रोत बन गया।
नासा और यूरोनास की हालिया डेटा के अनुसार, इस जलते क्षेत्र का आकार पिछले दो वर्षों में लगभग 15 % घटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटाव गैस भंडार के धीरे‑धीरे समाप्त होने, प्राकृतिक सीलिंग, या स्थानीय मौसम में बदलाव के कारण हो सकता है। कुछ रिपोर्टों में तुर्कमेन सरकार द्वारा बुझाने के प्रयत्नों की भी संभावना उठाई गई है, हालांकि आधिकारिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं मिली।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से यह दोधारी तलवार है। जलन कम होने से स्थानीय हवाई गुणवत्ता में थोड़ा सुधार हो सकता है, परन्तु यदि गैस धीरे‑धीरे लीक होकर जल नहीं रही है तो यह छुपी हुई मीथेन उत्सर्जन का संकेत हो सकता है—जो ग्रीनहाउस प्रभाव में सीधा योगदान देता है। अतः “नरक के द्वार” के घटते आकार को सच्चे “सफलता” के रूप में देखना अभी जल्दी है।
तुर्कमेनिस्तान की ऊर्जा नीति, विशेषकर गैस निर्यात, चीन‑रूस के साथ गठबंधन और भारत के साथ पाइपलाइन परियोजनाओं की योजना, इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी जोड़ती है। भारत ने हाल ही में तुर्कमेनिस्तान से प्राकृतिक गैस आयात करने के लिए “ट्रांस‑अज़ियाटिक गैस पाइपलाइन” की रूपरेखा तैयार की है; इसलिए इस क्षेत्र में स्थिरता भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर भी असर डाल सकती है।
वर्ल्ड बैंक, यूएनएफसीसी या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थान ने इस जलते “नरक” पर कोई ठोस अध्ययन या सहयोग नहीं किया है—एक ऐसी अँधेरी कोने की उपेक्षा जो शायद ही कभी प्रमुख जलवायु सम्मेलनों में चर्चा का विषय बनती है। ऐसा लग रहा है कि वैश्विक जलवायु वार्ता अपने “ग्रैंड विज़न” के साथ छोटे‑छोटे धुएँ को नजरअंदाज कर रही है, जबकि वही धुएँ स्थानीय जनता को साँस‑लेती बीमारी और पर्यावरणीय क्षय की ओर धकेलते हैं।
निष्कर्षतः, धुंधले होते “नरक के द्वार” को केवल आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक ज्वालामुखी‑गैस अनियमितताओं के संकेत के रूप में देखना चाहिए। नजदीकी निगरानी, संभावित बुझाने की योजना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता स्पष्ट है—खासतौर पर भारतीय नीति निर्माताओं के लिये, जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ जलवायु प्रतिबद्धताओं को संतुलित करने की चुनौती में हैं।
Published: May 5, 2026