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Category: दुनिया

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तुर्की ने 6,000 किमी रेंज वाला पहला ICBM 'यिल्डिरिमहान' पेश किया

इस्तांबुल के एक सैन्य परीक्षण स्थल पर 7 मई को तुर्की ने अपना पहला अंतरमहाद्वीपीय बॉलिस्टिक मिसाइल (ICBM) – यिल्डिरिमहान – की पहली उड़ान का प्रदर्शन किया। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि यह हथियार 6,000 किमी तक का प्रभाव क्षेत्र, अधिकतम माच 25 (लगभग 30,000 किमी/घंटा) की गति और 3,000 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकता है।

तकनीकी रूप से मानक जैसी बातों के पीछे एक गहरी रणनीतिक झलक है। टर्की ने पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय रक्षा नीति को तेज़ कर दिया है, और इस कदम से वह न केवल NATO के भीतर अपनी तकनीकी असमानता को पाटना चाहता है, बल्कि मध्य‑पूर्व में उभरती प्रतिस्पर्धा से भी खुद को सुरक्षित महसूस करना चाहता है। रूस, चीन और ईरान की बैलिस्टिक क्षमताओं के साथ तालमेल बनाने की कोशिश में, तुर्की ने शायद अपने NATO सहयोगियों को भी थोड़ा झटका देना चाहा है – क्योंकि NATO का सामूहिक रक्षा सिद्धांत अब तक केवल अक्षीय रक्षक बलों पर ही केंद्रित रहा था।

इसी बीच, भारत के लिए इस विकास का अप्रत्यक्ष महत्व बढ़ रहा है। भारत‑तुर्की आर्थिक एवं रक्षा सहयोग के नवीनतम समझौतों के तहत, दोनों देशों ने प्रौद्योगिकी साझेदारी के संकेत दिए थे। यिल्डिरिमहान की घोषणा इस साझेदारी को दोधारी तलवार बना सकती है: जहाँ भारत को संभावित तकनीकी हस्तांतरण का फायदा मिल सकता है, वहीं इससे रूस‑चीन‑तुर्की त्रिकोणीय गठबंधन का खतरा भी बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की महाशक्ति गणना में भारत को फिर से संतुलन बनाना पड़ सकता है।

वैश्विक स्तर पर इस कदम की प्रतिक्रिया मिले‑जुले हैं। अमेरिका ने यिल्डिरिमहान को “क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती” कहा, जबकि यूरोपीय संघ ने “नियंत्रण के साधनों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता” पर ज़ोर दिया। बहु‑पक्षीय नीतियों और द्विपक्षीय सहयोगों के बीच फंसे संस्थान अब यह तय करने में व्यस्त हैं कि इस नए पावर‑प्रोजेक्शन को किस प्रकार नियंत्रित किया जाए, क्योंकि तकनीक के विकास और कूटनीति के बीच का अंतर अक्सर इतना बड़ा होता है कि वह दो-तीन साल पहले की योजनाओं को भी अप्रचलित बना देता है।

संकुचन में, यिल्डिरिमहान न केवल तुर्की के रक्षा उत्साह को पुनः परिभाषित करता है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में मौजूदा असंतुलन को भी उजागर करता है। अब देखना बाकी है कि यह नई मिसाइल केवल शो‑केस रहेगी या फिर वास्तविक रणनीतिक विकल्प बनकर उभरेगी, और किस हद तक यह भारत जैसे गैर‑NATO मित्र देशों को अपनी रणनीतिक दिशा पुनः सुदृढ़ करने पर मजबूर करेगा।

Published: May 7, 2026