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Category: दुनिया

'डरावना' मामला: राजनीतिक उम्मीदवार पर हिंसक एंटीसेमिटिक हमला, स्कूल में बच्चे को बिन में फेंका गया, रॉयल कमीशन में गवाही

ऑस्ट्रेलिया के रॉयल कमीशन ऑन एंटीसेमिटिज़्म एंड सोशल कोहेज़न ने अपने तीसरे दिन बहुराष्ट्रीय स्तर पर घृणित शब्दों की बौछार को दस्तावेज़ किया। सुनवाई में जेहुदी समुदाय के दो अधिकारी और कई प्रत्यक्ष गवाहों ने बताया कि एक स्वतंत्र राजनीतिक उम्मीदवार, जोशुआ किर्श, को 2025 के उत्तरार्ध में न्यू साउथ वैल्स के ऊपरी सदन की चुनावी दौर में एंटीसेमिटिक हेटस्पीच, धमकी और बदनामियों का साक्षी बना।

किर्श के विज्ञापन, जो प्रगतिशील नीतियों की वकालत करते थे, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बीस‑सौं से अधिक घिनौने पोस्टों से घिर गये। "डायाब्लो वेंचर" जैसा लेबल, ज्यू‑कंट्रोल की षड्यंत्र सिद्धांत, और यहाँ तक कि "हैती का खून तुम्हारे मतों में" जैसी उकसाने वाली कविताएं भी साझा की गईं। इन सबके बीच, आयोग की सदस्यगण ने सवाल उठाया कि किस हद तक नियामक निकाय और प्लेटफ़ॉर्म कंपनियां इस दुष्ट विप्ले को रोकने में असफल रही हैं।

सम्प्रेषणीय उन्माद का एक अन्य पहलू भी सामने आया: एक प्राथमिक विद्यालय में दो कक्षा‑साथियों के बीच छोटा झगड़ा, जो अंत में एक सात साल के बच्चे को कचरे के बिन में फेंकने तक पहुंचा। इस बेतुकी घटना को ठीक वही ऑनलाइन प्रत्याशी‑भेदभाव की लहर के साथ जोड़ा गया, क्योंकि सामाजिक‑माध्यमों पर किशोरों को भी एंटीसेमिटिक मीम्स से परिचित कर दिया जा रहा है। न्यायालय ने इस प्रसंग को “सामाजिक ताने‑बाने को बिगाड़ने वाली ‘इंटरनेट गंदगी’ का बेमिसाल नमूना” कहा।

भौगोलिक दूरी बहुत दिलचस्प भी है। भारत में यह बात अंधाधुंध नहीं है कि सामुदायिक सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियामक बर्ताव के बीच टकराव अक्सर कूटनीतिक मोड़ बनाते हैं। भारत‑ऑस्ट्रेलिया संबंधों में हाल ही में रक्षा‑सुरक्षा समझौतों और विज्ञान‑प्रौद्योगिकी साझेदारी की नई लहर चल रही है, परन्तु एंटीसेमिटिज़्म से जुड़ी सामाजिक द्वैधता को कभी‑कभी दोपहर के चाय‑बिर्यानी की तरह अनदेखा किया जाता है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने पहले ही जलवायु, व्यापार और समुद्री सुरक्षा के तहत सहयोग के लिए पहल की थी, पर इस तरह के मानवाधिकार‑सम्बन्धी मुद्दों पर ठोस जवाबदेही की माँग कम ही सामने आती है।

रॉयल कमीशन ने इस बात को दोबारा दोहराया कि “व्यक्तिगत घृणा और सामुदायिक उत्पीड़न के बीच की रेखा को धुंधला कर देना, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को घाव पहुंचाता है”。 यह तर्क स्पष्ट करता है कि शक्ति संरचनाएं—जैसे बड़े सोशल‑मीडिया दिग्गज, चुनावी आयोग, और पुलिस—अक्सर “भेदभाव‑रहित” सार्वजनिक मंच का बहाना बनाते हुए वास्तविक रोकथाम से पीछे हटते हैं।

आलोचनात्मक नज़र से देखते हुए, हम देख सकते हैं कि ऑस्ट्रेलियाई लोकतंत्र ने ‘स्वतंत्र अभिव्यक्ति’ की धूमकेतु सीमा को थोड़ा‑बहुत विस्तारित किया, परन्तु जब यह सीमा एंटीसेमिटिक हिंसा में बदलती है, तो निगरानी तंत्र का ‘अस्पष्टता’ ही मुख्य कारण बन जाता है। क्योंकि “अस्पष्टता” भी कभी‑न-कभी एक नयी वैधता बन जाती है।

भविष्य के उपायों में स्पष्ट संकेत हैं: प्लेटफ़ॉर्मों को त्वरित हटाने के मानक स्थापित करना, ऑनलाइन घृणास्पद भाषण पर सख़्त दण्ड देना, और सामाजिक‑शिक्षा के माध्यम से युवा वर्ग को हिमांशु‑आभासी सेक्योरिटी के प्रति सतर्क बनाना। अगर इन पहलुओं को ‘क्लिक‑ए‑बाइ’ नीति से नहीं, बल्कि ‘सच्ची सामाजिक जोड़’ की भावना से लागू किया गया तो शायद ‘डरावना’ शब्द का प्रयोग कम ही होगा।

Published: May 6, 2026