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Category: दुनिया

ट्रम्प ने पोप लियो पर नई आँधी चलाते हुए इरान के परमाणु अधिकार को काथोलिकों के लिए खतरा कहा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को पाप के रूप में पोप लियो को निशाना बनाते हुए कहा कि उनके इरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति देने के बयान ने “काथोलिकों को बड़े खतरे में डाल दिया है”। ट्रम्प का यह बयान तब आया जब उनका विदेश मंत्री, मारको रुबियो, दो दिनों बाद वैटिकन की ओर निकलने वाले हैं, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की कड़ी रेखा को कुछ हद तक नरम करना है।

पोप लियो ने हाल ही में इरान के नाभिकीय कार्यक्रम को एक “हाथी के कंधे” के रूप में खारिज किया, यह संकेत देते हुए कि वार्ता और कूटनीतिक समाधान ही एकमात्र विकल्प है। यह बयान इस बात के बाद आया जब संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने इरान के संभावित परमाणु विकास को रोकने हेतु सैन्य कार्रवाई की धमकी भरी थी। ट्रम्प ने इस मोड़ पर इस शांति-समर्थन की ऋणात्मक व्याख्या कर, पोप को “उग्र एंटी-टेरर” के बदले “उग्र एंटी-काथोलिक” के रूप में चित्रित किया।

अमेरिकी विदेश नीति के दोहरे मानकों पर सवाल उठता है। एक ओर, ट्रम्प प्रशासन ने इज़राइल के साथ मिलकर इरान के खिलाफ सख़्त रुख अपनाया, तो दूसरी ओर वही प्रशासन पोप के नैतिक स्वर को “राष्ट्र की सुरक्षा के लिये असहज” कह कर खारिज कर रहा है। इस असंगतिपूर्ण भाषा को देख कर यह समझना कठिन नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर बोलचाल को अक्सर घरेलू चुनावी आंकड़ों के साथ मिलाया जाता है। जैसा कि एक अभिज्ञानी ने कहा, “ट्रम्प की रैली में धर्म के साथ राजनीति का मिश्रण अक्सर कूटनीति के मानचित्र को स्याह‑सफेद चेकर्ड पैटर्न में बदल देता है।”

रुबियो की वैटिकन यात्रा का मकसद दोहरी है: पोप के साथ रिश्ते को सुधराना और इरान‑इज़राइल‑अमेरिका त्रिकोण पर चल रहे तनाव को कम करना। अगर विदेश मंत्री सफल होते हैं तो अमेरिकी विदेश नीति में थोड़ी शहरी शीतलता लौट आ सकती है। यदि नहीं, तो ट्रम्प के शब्दों पर निकली कूटनीतिक प्रतिक्रिया भारत के लिए भी नज़र रखेगी।

भारत के लिए यह स्थिति दो मुख्य प्रश्न उठाती है। पहला, इरान से तेल आयात और एकीकृत आर्थिक संबंध को बनाए रखने की तुलना में, न्यूयॉर्क‑वॉशिंगटन द्वारा इज़राइल को अधिक समर्थन देने के चलते द्विपक्षीय रिश्ते पर दबाव बढ़ रहा है। दूसरा, वैटिकन का वैश्विक शांतिप्रभाव, खासकर मध्य‑पूर्व में, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और परराष्ट्र नीति में एक मध्यम शक्ति के रूप में उसकी भूमिका को प्रभावित कर सकता है। भारत की रणनीतिक समुदाय इस बात पर संकेत करती है कि, चाहे पोप द्वारा कोई भी बयान हो, उसकी नैतिक अधिकारिता को सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा या आर्थिक हितों पर असर नहीं पड़ेगा, परन्तु अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे उचित स्थान देना अब भी राजनयिक कौशल का परीक्षण है।

संक्षेप में, ट्रम्प की पोप पर नई टिप्पणी अमेरिकी विदेश नीति के “आत्महत्या” की ओर एक और कदम है—एक बयान जो काथोलिकों को बचाने के बदले एक ही समय में अमेरिकी हितों को अनिश्चित बना रहा है। फिर भी, यदि विदेश मंत्री रुबियो वैटिकन में सफलतापूर्वक कूटनीतिक पुल बनाते हैं, तो यह अभियान शायद ही नहीं, बल्कि एक “हॉस्पिटलिटी” के रूप में समाप्त हो सकता है, जहाँ दो देशों के बीच “नरमी” की खुराक मिलती है, जबकि जनसमूह को गले लगाने वाला शोरभरा ट्रम्प अभी भी मंच पर अपनी अगली झटके की तैयारी कर रहा है।

Published: May 6, 2026