ट्रम्प ने ईरान समझौते की उम्मीद में होर्मुज़ जलधारा में यूएस ऑपरेशन को रोका
वाशिंगटन ने 5 मई, 2026 को आधिकारिक तौर पर ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को निलंबित कर दिया, जिसका उद्देश्य स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में व्यापार मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि इस कदम का प्रमुख कारण ईरान के साथ संभावित समझौते को अंतिम रूप देने का प्रयास है।
‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को 2024 में लॉन्च किया गया था, जब इस्तोफ़ा के बाद भी ईरान की परमाणु गतिविधियों और समुद्री डाकू प्रचंडता को लेकर अमेरिकी नौसैनिक तैनाती बढ़ा दी गई थी। दो साल की तैनाती ने कई बार यूएस‑इज़रायली संयुक्त अभ्यास, फिशिंग‑ड्रोन निगरानी और यूएस वाणिज्यिक शिपिंग के लिए ‘दमदार’ प्रत्याक्षर प्रदान किया था। अब, ट्रम्प की इस अचानक रुकावट को दो भागों में पढ़ा जा सकता है: कूटनीतिक संकेत और घरेलू राजनीति दोनों का मिश्रण।
ईरान के साथ बातचीत की जड़ता ने आधी अर्ध-समुद्रीय कूटनीति का दाँव दांव को दांव पर लगा दिया है। सत्ता में रहने वाले कड़े‑संकल्पी राष्ट्रपति पक्ष के कई बुनियादी अधिकारी इस बात से असहज दिखते हैं कि एक सैन्य‑आधारित परियोजना को ‘संभावित समझौते के लिए बिचौलिए’ बनाया जा रहा है। यूएस के ‘ऑपरेशन फ्रीडम’ के पुनरावलोकन में, मिलिट्री स्टाफ जेनरल का एक वरिष्ठ अधिकारी ने टिप्पणी की, “हमने अपनी नौसैनिक शक्ति को एक बड़े बोर्ड गेम की बोरड में रख दिया है, जहाँ हम शतरंज के घोड़े को रौशन करने से पहले समझौते की पेंटिंग को देख रहे हैं।”
ऐसे में, क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रियाएँ भी बारीकी से देखी जा रही हैं। ईरान ने अभी तक इस रुकावट पर औपचारिक टिप्पणी नहीं दी, पर तेल निर्यात के प्रमुख मार्ग पर ‘अस्थिरता से वंचित’ होने का संकेत मिल रहा है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने संभावित ‘धुआँ धुएँ’ से बचने के लिए तटस्थता का आह्वान किया, जबकि ओमान ने द्विपक्षीय वार्ता के लिए द्वार खोलने की इच्छा जताई।
भारत के लिए होर्मुज़ का महत्त्व सिर्फ भू‑राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। भारत विश्व की तिलिस्मित तेल आयात करने वाली पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहाँ लगभग 20 % तेल सख्ती से इस जलधारा से गुजरता है। न्यू दिल्ली ने इस बदलाव को करीब से मॉनिटर किया है और विदेश मंत्रालय ने कहा कि कोई भी अनिश्चितता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित नहीं कर सकती, पर साथ ही यह भी कहा कि भारत ‘ज्यादा से ज्यादा समझौते के तेज़ी से खोलने के पक्ष में’ है, जिससे क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।
‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ को ठहराकर ट्रम्प ने एक दोधारी तलवार खींची है। एक ओर, इस कदम से ईरान को बातचीत में एक बेहतर स्थिति मिलने की सम्भावना है; दूसरी ओर, अमेरिकी नौसैनिक विश्वसनीयता को धुंधला करने का खतरा है, विशेषकर तब जब यूएस‑इज़राइल‑सऊदी गठबंधन पर भरोसा करता है। यह भी सवाल उठता है कि क्या यह ‘विराम’ केवल एक कूटनीतिक इशारा है या व्यावहारिक रूप से समझौते की दिशा में एक वास्तविक कदम। पिछले दो दशकों में देखा गया है कि अमेरिकी प्रशासन अक्सर ‘बड़ी आवाज़ वाले’ घोषणाओं के बाद साइलेंट मोड पर आ जाता है—जैसे 2020 में ‘ऑपरेशन अटलांटिक शील्ड’ के बाद अचानक वार्षिक बजट में कटौती।
नतीजतन, होर्मुज़ में शिपिंग सुरक्षा के लिये अस्थायी अंतराल उत्पन्न हो सकता है, जिससे तेल के दाम में अस्थिरता और वैश्विक बाजार में हल्की हलचल देखी जा सकती है। यदि ईरान‑अमेरिका के बीच समझौता फॉर्मल हो जाता है, तो अमेरिका की ‘सैन्य‑शरीर’ बिना असली प्रतिबद्धता के केवल ‘डेमो’ बन कर रह जाएगा। यह स्थिति वैश्विक शक्ति-संरचना में एक नया मोड़ दर्शा सकती है—जहाँ कूटनीति का ‘बसंत’ जल्दी एक ‘शरद’ में बदल जाता है, और बड़े‑बड़े नाम वाले प्रोजेक्ट्स सिर्फ शब्दों के खेल बनकर रह जाते हैं।
Published: May 6, 2026