ट्रम्प ने इरान सौदे में होरमुज़ ऑपरेशन को विराम देने का संकेत, यू.एस. ने 'ऑपरेशन एपीक फ्यूरी' का एलान किया समाप्त
इज़राइल और ईरान के बीच तीव्र सामरिक टकराव के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने दो बड़े बयान जारी किए। अमेरिकी विदेश मंत्री मारको रूबियो ने कहा कि वॉशिंगटन ने अपना "ऑपरेशन एपीक फ्यूरी" नामक आक्रामक अभियान पूरी तरह समाप्त कर दिया है, जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होरमुज़ जलडमरूमध्य में चल रहे सैन्य ऑपरेशन को अस्थायी रूप से रोकने की संभावना पर ज़ोर दिया, ताकि इरान के साथ नई वार्ता के दरवाज़े खुलें।
ऑपरेशन एपीक फ्यूरी, जिसे मई 2025 में शुरू किया गया था, का उद्देश्य ईरान की समुद्री डाकूता रोकना और इज़राइल को संभावित इरानी हमला से बचाना था। रूबियो ने इस अभियान को "सफलता की सीमा पर" पहुंचा कर बंद कर दिया, यह संकेत देते हुए कि अब "विपक्षी कोटि" को गंभीर नुकसान पहुँचाने की आवश्यकता नहीं है।
ट्रम्प की ओर से इस बार होरमुज़ कोरिडोर में संदेहास्पद "विराम" का संकेत, अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग और तेल की आपूर्ति श्रृंखला पर गहरा असर डालता है। होरमुज़ विश्व के सबसे महंगे तेल मार्गों में से एक है; इसके बंद होने पर यूरोप और एशिया को वैकल्पिक (और महंगे) मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं। भारत, जो अपने अधिकांश तेल आयात मध्य पूर्व से करता है, इस बदलाव से प्रत्यक्ष प्रभावित होगा। भारतीय ऊर्जा आयात नीति के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि दीर्घकालिक अस्थिरता भारत को रणनीतिक स्नैक रिवर्स को दोबारा सोचने पर मजबूर कर सकती है।
दूसरी ओर, यू.एस. की इस दोहरी नीति—ऑपरेशन समाप्त, फिर भी जलडमरूमध्य पर दबाव बनाए रखने की इच्छा—अंतरराष्ट्रीय मंच पर वर्गीकृत असंगति को उजागर करती है। जब एक ओर अमेरिकी कूटनीति "वार्ता के द्वार खोलने" की बात करती है, तो दूसरी ओर वही सैन्य प्रचंडता से क्षेत्रीय संतुलन को अस्थिर रखने का जोखिम मंडरा रहा है। यह निहित है कि कूटनीतिक भाषण अक्सर ही हताशा में लिखे गए बैले होते हैं, जबकि वास्तविक कार्रवाई में वही पुरानी शक्ति खींची जाती है।
संक्षेप में, इरान-इज़राइल युद्ध के पृष्ठभूमि में अब अमेरिका अपनी सैन्य भागीदारी को आधिकारिक रूप से समाप्त कर रहा है, परन्तु आर्थिक दबाव के उपकरण—जैसे होरमुज़ पर ऑपरेशन—को पूरी तरह से बंद नहीं कर रहा। इस अस्पष्ट संतुलन में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक मध्यमार्गी और क्षेत्रीय स्थिरता के बीच कठिन चयन करना पड़ेगा। अंततः, जब बड़े शक्तियों के बयान और कार्रवाई में दूरी बढ़ती है, तो बचे हुए छोटे-छोटे राष्ट्रों को ही हवा में संतुलन बनाना पड़ता है—कभी‑कभी स्याही से, कभी‑कभी धुएँ से।
Published: May 6, 2026