ट्रम्प की निंदा दर अभूतपूर्व 62% तक पहुंची, इरान युद्ध के आर्थिक उलटफेरे का असर
वाशिंगटन पोस्ट‑ABC न्यूज़‑इप्सोस के नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को वर्तमान में 62% निंदा दर मिली है। यह प्रतिशत उनकी दो कार्यकालों में अब तक का सबसे खराब अंक दर्शाता है, और यह आंकड़ा विशेष रूप से महंगाई, जीविकीय लागत और इरान पर अति‑आक्रामक नीति के बाद उभरा है।
फरवरी में शुरू हुए इरान के खिलाफ युद्ध को लगभग पूरी तरह से निराधार माना गया था, फिर भी इसका प्रतिफल वैश्विक तेल बाजार में गहरा संकट बन गया। ओपन मार्केट में तेल की कीमतें चार सालों में सर्वाधिक स्तर पर पहुंच गईं, जिससे पंप पर गैस की कीमतें अभूतपूर्व रूप में बढ़ी। अमेरिकी घरों में पेट्रोल की टैंक भरने की लागत अब कागज पर लिखे बजट से अधिक महंगी हो गई है, और यही कारण है कि जनता ने अपने असंतोष को मतदान में बदल दिया।
इसी आर्थिक दबाव के चलते आगामी नवंबर के मध्यवर्ती चुनावों की रस्में अब और अधिक तीव्र हो रही हैं। डेमोक्रेट्स को इस आर्थिक तानाशाही का फायदा उठाने की उम्मीद है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी ट्रम्प-रैपिंग रणनीतियों पर सवाल उठ रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय नीति‑निर्णय पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं: एक राष्ट्रपति जो विदेश में युद्ध को आर्थिक हथियार बना देता है, वह घरेलू स्थिरता के साथ कैसे सामंजस्य स्थापित कर सकता है?
भारत के लिए इस विकास का प्रतिफल दोहरे धुरे में निहित है। भारत विश्व के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है; ईंधन की कीमतों में उछाल सीधे भारतीय ट्रांसपोर्ट, कृषि इनपुट और औद्योगिक लागतों को बढ़ाता है। इसके अलावा, अमेरिकी‑इज़राइल‑सऊदी गठबंधन की अस्थिरता भारतीय विदेश नीति को पुनः संतुलन‑रहित बनाती है, जहाँ नई ऊर्जा साझेदारियों और वैकल्पिक तेल स्रोतों की खोज पहले से ही तेज़ी से चल रही है।
विवादास्पद तौर‑तरीके इस बात की ओर इशारा करते हैं कि प्रशासनिक बयानबाजी और नीति‑परिणाम के बीच की दूरी अब और अधिक स्पष्ट हो गई है। जब राष्ट्रपति अक्सर "ध्रुवीकरण" को राष्ट्रीय पहचाने का हिस्सा बताते हैं, तब असल में वह आर्थिक अस्थिरता और कूटनीतिक अलगाव की कठोर सच्चाई को ढकने की कोशिश कर रहे होते हैं। एक ओर वॉल‑स्ट्रिट के 'ज्वालामुखी' को शांत करने की घोषणा, और दूसरी ओर यूँ तो घरेलू उपभोक्ता सड़कों पर पेट्रोल की कीमतों से जलते हैं, इस द्वैत को देखते हुए नीति‑निर्माताओं की लिप्टता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
संक्षेप में, ट्रम्प की निंदा दर में अभूतपूर्व उछाल केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता का माप नहीं, बल्कि अमेरिकी आर्थिक नीतियों के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की सच्ची खबर है। इस जोड़े में भारत जैसे उभरते बाजार को अपने ऊर्जा‑सुरक्षा, कूटनीति और आर्थिक योजना को पुनः परिभाषित करना पड़ेगा—और यह सब तब है, जब अमेरिकी राजनीति खुद को अभूतपूर्व अराजकता के बीच देख रही है।
Published: May 4, 2026