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Category: दुनिया

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ट्रम्प का ईरान शांति समझौता आशा के साथ संशय का ताना‑बाना

वॉशिंगटन में इस हफ़्ते दो‑तीन संकेत मिलते‑जुलते रहे हैं। दो साल पहले फिर से राष्ट्रपति पद पर कब्ज़ा जमाए डोनाल्ड ट्रम्प ने, मध्य‑पूर्व में चल रहे संघर्ष‑परिदृश्य को समाप्त करने के लिये ईरान के साथ संभावित शांति‑समझौता बनाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन उसी मंच पर उन्होंने समझौते में कई ‘कवायट’ (caveats) भी जोड़ दिए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि आशा की रौशनी के साथ साथ सावधानी की छाया भी बरस रही है।

इसी समय, इज़राइल‑हामास युद्ध के कारण ईरान की सूक्ष्म‑सहायता, ईराक और सीरिया में प्रॉक्सी ग्रुपों के समर्थन को लेकर कूटनीतिक जलती हुई दबाव की लहरें बढ़ रही थीं। ट्रम्प के बयान ने संकेत दिया कि वह ईरान से उसकी सशस्त्र नेटवर्क को घटाने और परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के तहत रखने की शर्त रखेंगे। इन ‘संशयों’ को अनदेखा करना, वास्तव में, अमेरिकी विदेश नीति की मौजूदा शत्रु‑संबंधी नीति और आगामी घरेलू चुनावी रणनीति के बीच की खाई को उजागर करता है।

संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इज़राइल जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ियों ने इस प्रस्ताव पर सतर्क प्रतिक्रियाएँ दीं। इन देशों ने खुलकर कहा कि वे ईरान पर भरोसा नहीं कर सकते, खासकर जब उसके जलवायु‑परिवर्तित क्षेत्रों में सक्रिय गुप्त कार्य जारी हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में ईरान के खिलाफ स्थायी प्रतिबंधों को हटाने की अमेरिकी पहल को कई यूरोपीय सदस्य राष्ट्रों ने ‘जायज़’ और ‘अति‑आक्रामक’ कहा। यही वह अंतरराष्ट्रीय सत्ता‑संरचना है, जहाँ ‘सतह पर शांति की गूँज’ के साथ ‘दरारों से भरपूर असलियत’ गुदगुदी करती है।

भारत के लिये इस परिदृश्य में दो प्रमुख प्रभाव उभरते हैं। पहला, मध्य‑पूर्व की अस्थिरता के कारण तेल की कीमतों में परिवर्तन सीधे भारतीय ऊर्जा आयात को प्रभावित करता है; शांति‑संभवना का संकेत, अगर सच्चा हो, तो अस्थायी रूप से कीमतों को स्थिर कर सकता है। दूसरा, भारतीय विदेश नीति की ‘स्वतंत्रता’ की परंपरा को इस परिदृश्य में ‘संभवित बड़े‑पैमाने पर मध्य‑पूर्व पुनर्स्थापन’ का अहसास दिलाता है, जहाँ भारत को एक निचले स्तर के मध्यस्थ या रणनीतिक साझेदार के रूप में आँका जा सकता है।

सारांश में, ट्रम्प की आशा‑पूर्ण घोषणा एक तरह की ‘राजनीतिक फेरी’ लगती है, जहाँ टेबल के एक छोर पर शांति की गहरी साँसें आती हैं और दूसरी ओर कोटा‑कुशल ‘संदेह’ की नज़रें टिकी हैं। वास्तविकता यह है कि सीमा‑परिचालन, कांग्रेस की निगरानी, और ईरान के भीतर के कठोर सत्ताकेंद्रों की असहयोगिता, इस समझौते को केवल कागज पर ही नहीं, बल्कि वैचारिक तौर पर भी ‘अदृश्य’ बना सकते हैं। इस हलचल के बीच, भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति को लचीलापन देने और भू‑राजनीतिक जोखिम‑परिचालन को संतुलित करने के लिये द्विपक्षीय संवाद को तेज़ करना ही समझदारी होगी।

Published: May 7, 2026