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जम्मू-कश्मीर ने युवाओं में नशीली दवा की लत रोकने के लिए नई अभियान शुरू किया
विलंबित आँकड़ों के अनुसार, भारत‑प्रशासन वाले जम्मू‑कश्मीर में युवा वर्ग में नशीली दवाओं का सेवन लगातार बढ़ रहा है। इस प्रैसिंग को देखते हुए प्रशासकीय प्रमुख ने 7 मे, 2026 को एक राष्ट्रीय स्तर का अभियान ‘निशा‑मुक्त युवा’ लॉन्च किया। यह कदम प्रदेश के स्वास्थ्य, पुलिस तथा सामाजिक कल्याण विभागों के सहयोग से तैयार किया गया है, जिसमें इंटीग्रेटेड जागरूकता, नशा‑मुक्ती केंद्र एवं पुनर्वास कार्यक्रमों को प्रमुखता दी गई है।
अभियान के प्रमुख बिंदु हैं: स्कूल‑कॉलेज में नशा‑रोकथाम शिक्षा, मोबाइल काउंसलिंग यूनिट, और सामाजिक उद्यमियों की भागीदारी से चलाए जाने वाले ‘कौशल‑विकास कार्यशालाएँ’। साथ ही, स्थानीय NGOs को वित्तीय अनुदान प्रदान कर फुर्सत के समय में नशे के विकल्प प्रदान किए जाएंगे। राज्य सरकार ने कहा कि 2025‑26 में ड्रग‑सेवित मामलों में 12 % की वृद्धि दर्ज की गई, जो कि राष्ट्रीय औसत से निर्धारित रूप से अधिक है।
वैश्विक कारक भी इस अभियान को समझाने में मददगार हैं। अफगानिस्तान से उत्पन्न अफीम के पारगमन मार्ग, जो अक्सर पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरते हैं, जम्मू‑कश्मीर को एक अनिच्छित ट्रांसिट प्वाइंट बना देते हैं। संयुक्त राष्ट्र ऑफिस ऑफ़ ड्रग एनफ़ोर्समेंट एंड क्राइम (UNODC) की 2025 की रिपोर्ट ने आशिया‑पैसिफिक में सिंथेटिक ड्रग्स के तेज़ विस्तार का उल्लेख किया है, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप को एक संभावित ‘हब’ माना गया है। इस ढांचे में, जम्मू‑कश्मीर की सरकार का नया अभियान अधिकतर प्रतीकात्मक प्रतीत हो सकता है, परन्तु यह एक निकासी‑पर‑अनुमान (‘damage‑control’) रणनीति भी दर्शाता है।
नीति‑परिणाम के पहलू पर नज़र डालें तो, 2022 में केंद्रीय सरकार ने एनडीपीएस (नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टेंस) अधिनियम में संशोधन करके अधिक कठोर दंड और तेज़ ट्रायल प्रक्रिया लागू की थी। फिर भी, स्थानीय प्रशासन द्वारा स्वयं‑संचालित पहल की ज़रूरत इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर की नीतियां अक्सर प्रदेश‑विशिष्ट सामाजिक‑सांस्कृतिक जटिलताओं को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं कर पातीं। यहाँ ‘शांतिपूर्ण स्थिरता’ के नाम पर जारी सुरक्षा ख़र्च और प्रतिबंधात्मक उपायों के बीच नशा‑रोकथाम को प्राथमिकता देना, एक असामान्य नीति‑पहचान का संकेत देता है।
भारतीय पाठकों के लिए यह विकास दो पहलुओं को उजागर करता है। पहला, यह दर्शाता है कि भारत‑प्रशासन वाले क्षेत्रों में भी, जहाँ अक्सर सुरक्षा‑संबंधी विवादों की चर्चा होती है, सामाजिक‑स्वास्थ्य मुद्दे आधे‑पैकेज के तौर पर नहीं रह जाते। दूसरा, यह भारत‑पाकिस्तान के बीच नशा‑ट्रैफ़िक को लेकर मौजूदा कूटनीतिक जटिलताओं को परोक्ष रूप से उजागर करता है—क्योंकि नशीली दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला अक्सर दोनों देशों के सीमाओं पर उलझी रहती है। इस परिप्रेक्ष्य में, ‘निशा‑मुक्त युवा’ केवल एक वैध सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति‑संतुलन में अलग‑अलग हितों के बीच झुलसता एक पतला काँच का शीशा भी बन जाता है।
ऐसे में, यदि अभियान वास्तविक सामाजिक‑सुधार के साथ नक्सा‑परिवर्तित नीतियों से विहीन रहता है, तो यह केवल ‘बजट‑लाइन‑पर स्लोगन’ बन कर रह सकता है। लेकिन यदि प्रधान मंत्री के ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भविष्य’ के वादों के साथ सुसंगत, साक्ष्य‑आधारित हस्तक्षेप और निरंतर फॉलो‑अप सुनिश्चित किया जाता है, तो यह जम्मू‑कश्मीर में नशा‑मुक्ती के प्रतिबद्धता को नई दिशा दे सकता है। समय ही बताएगा कि यह पहल सिर्फ एक ‘राजनीतिक शौक़ीनता’ है या वास्तव में युवा शक्ति को नशीली दवाओं के सायँसे से मुक्त करने की ठोस कोशिश।
Published: May 7, 2026