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जोसिया हेंसन की विरासत: 'अंकल टॉम' की बदनामी को समाप्त करने की पहल
अमेरिकी दासता के इतिहास में एक नाम बार‑बार छाया रहा है – अंकल टॉम। 19वीं सदी के मध्य में हारी किए गए दासों की पीड़ा को उजागर करने वाले हॅरिएट बीचर स्टॉउन की काल्पनिक कृति के कारण यह शब्द अब एक निंदा बन गया है। परंतु जिस वास्तविक व्यक्तित्व ने इस छवि को उत्पन्न किया, वह था जोसिया हेंसन (1795‑1883) – एक सच्चा मुक्तिदाता, स्कूल‑स्थापना कर्ता और लिखित स्मारक ‘ड्राइंग‑ऑफ़‑मेमोयर’ के लेखक।
हेंसन ने लगभग 42 साल तक दासता में बितायी, फिर 1830 में उत्तरी‑पश्चिमी कैरोलाइना से कनाडा के मॉन्ट्रियल के पास एंटवाइक‑ऑन‑द‑हिल में शरण ली। यहाँ उन्होंने द फ्री स्कूल ऑफ़ एंटवाइक की स्थापना की, दो सौ से अधिक दासों को नागरिकता का अधिकार दिलाने में मदद की और ‘अंडरग्राउंड रेलरोड’ के प्रमुख चालक में बदल गये। इस गौरवशाली बहु‑कार्यक्रम के बावजूद, उनका घर पाँच शताब्दियों के बाद तक ‘अंकल टॉम’ के नाम से ही जाना जाता रहा।
पिछले महीनों में स्थानीय विरासत समिति और दो‑तीन शैक्षणिक संस्थानों ने इस नाम‑विरोध को सार्वजनिक रूप से उठाया। उन्होंने कहा कि ‘अंकल टॉम’ शब्द का अर्थ अब आलोचनात्मक निष्ठा से जुड़ा है, और इस अस्वीकृत “लैबिल” को आधुनिकीकरण के साथ हटाना ‘ऐतिहासिक सच्चाई’ की रक्षा है। इस पहल का समर्थन कई अफ्रीकी‑अमेरिकी विद्वानों और नागरिक अधिकार समूहों ने किया, जबकि कुछ संरक्षणवादी इतिहासकारों ने चेतावनी दी कि स्मृति‑सहीताओं को ‘विनाश’‑के रूप में देखना अहिंसात्मक संघर्ष में बाधा बन सकता है।
दूरस्थ रूप से देखें तो यह नाम‑परिवर्तन संघर्ष वैश्विक शक्ति‑संरचनाओं के पुनर्मूल्यांकन की निरंतरता है। यूरोपीय उपनिवेशवाद के पुनर्मूल्यांकन को लेकर ‘वापसी‑पर-दुर्लभ’ शिल्पियों (जैसे ब्रिटिश महाराज प्रतिमा हटाना) और भारत में ‘बड़ी बाग़ी’ को ‘राष्ट्र पिताओं’ के रूप में पुनः सशक्त करना इसी तरह का सरलीकृत उदाहरण है। भारत के पाठकों के लिये यह विरोधाभास विशेष रूप से रोचक है, क्योंकि भारतीय इतिहास में भी कई बार “स्मार्ट‑नाम‑बदलाव” के माध्यम से उपनिवेशी ठहराव को ‘देशभक्ति’ में बदल दिया गया – जैसे ‘राष्ट्रपति सिंहासन’ को ‘भारतीय लोकतंत्र का लहूफल’ कहा जाना।
नीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला केवल एक पेंटर‑साइन का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक धरोहर नीति, संग्रहालय प्रबंधन और शैक्षिक पाठ्यक्रमों के बीच का एक जाल है। यदि हेंसन के घर को ‘जोसिया हेंसन हाउस’ के रूप में नई पहचान दी गई, तो यह भारतीय संस्थाओं के लिए भी एक संकेत बन सकता है — कि चयनात्मक स्मृति को ‘स्थाई’ बनाने के लिए सक्रिय पहल की आवश्यकता है, न कि बायोलॉजिकल या राजनैतिक दबाव का इंतजार।
चूँकि इस वर्ष संकल्प (UNESCO) के ‘स्लाव्य विरासत’ को पुनः परिभाषित करने की दुविधा पर वैश्विक स्तर पर बहस चल रही है, हेंसन के घर का पुनःनामांकन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नमूना बन सकता है। इसे सफल करने पर राष्ट्रीय संग्रहालय, शैक्षिक बोर्ड और स्थानीय समुदाय, सभी को मिलकर ‘सही नाम, सही इतिहास’ की नई लहर का हिस्सा मानना होगा।
संकल्प स्पष्ट है: इतिहास को पुनर्लेखन नहीं, बल्कि पुनःउद्धरण करना चाहिए। और यदि यह पुनःउद्धरण हमारे ‘अंकल टॉम’ को जोसिया हेंसन में बदल दे, तो शायद हम कम से कम एक छोटा‑सा कदम इस दिशा में ले चुके होंगे।
Published: May 6, 2026