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जापानी होजिचा पर लहर: यूके के मेन्यू में नई चाय का उभार
जापान की रोस्टेड हरी चाय, होजिचा, पिछले दो वर्षों में ब्रिटेन के कैफ़े, बिस्ट्रो और उच्चस्तरीय रेस्तरां के मेन्यू में प्रवेश कर चुकी है। लट्टे, आइसक्रीम, स्मूदी और यहाँ तक कि फाइंड डेज़र्ट तक में इसका इस्तेमाल हो रहा है, जिससे इस “नॉन‑मैचा” साथी को नई पहचान मिल रही है।
होजिचा की लोकप्रियता को अक्सर 2023 में लंदन के कुछ फूड‑फेस्टिवल में पहली बार पेश किए जाने से जोड़ा जाता है। तब से, प्रमुख चेन जैसे टॉडल्स, क्लीवलैंड कैफ़े और फ़्रैंचाइज़्ड आइसक्रीम ब्रांडों ने मेन्यू में इसे जोड़ दिया। उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, 2025‑26 वित्तीय वर्ष में यूके में होजिचा‑आधारित उत्पादों की बिक्री में 37 % की वार्षिक वृद्धि देखी गई।
यह वृद्धि केवल उपभोक्ता स्वाद के बदलाव का परिणाम नहीं है, बल्कि जापानी सरकारी एजेंसियों और व्यापार मंडलों के सक्रिय निर्यात‑प्रोत्साहन का भी प्रतिफल है। जापान ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट (JETRO) ने 2024 में “स्मार्ट बिवरेज” पहल के तहत यूके के खाद्य‑सेवा उद्योग को लक्ष्य बनाते हुए 15 % अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान की। वहीं, विदेश मंत्रालय की “कुलिनरी डिप्लोमेसी” रणनीति ने होजिचा को जापान‑ब्रिटेन सांस्कृतिक कूटनीति की नई प्रतीकात्मक वस्तु बना दिया।
आर्थिक संदर्भ में, यूके‑जापान व्यापार समझौते (2021) ने चाय‑उत्पादों पर शून्य टैरिफ़ लागू कर दिया, जबकि यूरोपीय संघ के समान वस्तुओं पर 5‑6 % आयात शुल्क रहता है। इस असमानता ने कुछ यूरोपीय आयातकों को असहज किया है, जो अब जापानी होजिचा के तुलनीय उच्च मूल्य को “ग्लोबल प्रीमियम” कहते हुए, घरेलू ब्रांडों को कम कीमत पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए बाध्य महसूस करते हैं।
उपभोक्ता‑स्वास्थ्य के पक्षधर यह दावा करते हैं कि रोस्टेड पत्तियों की प्रक्रिया से कॅफ़ीन कम और एंटीऑक्सीडेंट संरक्षित रहते हैं, जिससे यह “सुगंधित, कम उत्तेजक” विकल्प बन जाता है। हालांकि, स्वतंत्र शोध संस्थानों ने बताया है कि इन लाभों को प्रमाणित करने के लिए अभी बड़ा क्लिनिकल डेटा नहीं है—एक और मार्केटिंग‑जागरूक कथा जो आगे के नियामक निरीक्षण की माँग करती है।
भारत के लिए इसका क्या अर्थ है? देश में चाय का उपभोग विश्व‑सर्वोच्च है, परन्तु अधिकांश उपभोक्ता काली या हर्बल चाय पर ही टिके हुए हैं। यदि होजिचा जैसे “जापानी‑स्टाइल” उत्पादों का भारत में प्रवेश होता है, तो यह भारतीय चाय निर्यातकों को नई प्रतिस्पर्धा का सामना करने का अहसास करा सकता है। साथ ही, भारतीय रेस्टोरेंट चेन को यह अवसर मिल सकता है कि वे अपने मेन्यू में होजिचा‑आधारित वस्तुओं को जोड़ कर युवा, स्वास्थ्य‑सचेत वर्ग को आकर्षित कर सकें—जैसे उन्होंने मैचा के साथ किया था।
समाज‑आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हुए, यह ट्रेंड दिखाता है कि फूड‑ट्रेंड्स कितनी जल्दी कूटनीति की मार्गदर्शक‑पत्रिकाओं से “हिप‑स्ट्रीट” बन जाते हैं। जब तक सरकारें नीतिगत ढांचा बनाते हैं—जैसे स्पष्ट लेबलिंग, आयात‑सुरक्षा, और झूठे स्वास्थ्य‑दावों पर सख्त नियंत्रण—तक तक “होजिचा बूम” केवल एक मूल्य‑रहित नस्लीय उपभोग का रूप बन सकता है।
Published: May 9, 2026