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Category: दुनिया

जापान की दशकों की सबसे बड़ी जंगलगी को 11‑दिन में रोका, 17 वर्ग किमी जलता

जापान के उत्तरी भाग में 3 मई को शुरू हुई भयानक जंगलगी को अंततः 13 मई तक नियंत्रित किया गया, जिससे लगभग 17 वर्ग किलोमीटर (न्यूयॉर्क सिटी के सेंट्रल पार्क से पाँच गुना बड़े) क्षेत्र को धुंधले धुँए में ढँक दिया गया। यह हादसा जापान के आधुनिक आपदा प्रबंधन प्रणाली पर पहला गंभीर परीक्षा बन गया, जहाँ आधे दशक तक ऐसी तीव्र आग नहीं देखी गई थी।

आग को रोकने में किनारे‑किनारे के सेना, एयरोड्रम के हेलीकॉप्टर और स्थानीय स्वयंसेवी दलों को 11 दिन तक लगातार जुटना पड़ा। प्रारम्भिक रिपोर्टों के अनुसार, तेज़ हवाओं और शुष्क मौसम के साथ ही कई लेंसिंग उपकरणों का विफल होना, बचाव कार्य को अधिक जटिल बना दिया। इस दौरान पाँच‑सत्री फायर‑फ़ाइटर्स की टीमें प्रत्येक रात को बेस कैंप से फिर से ज्वाला की ओर लौटतीं, जिससे "ऑपरेशन दुरुस्तियों की ऊँचाई" पर एक सूखी मज़ाकिया टिप्पणी भी उभरी – “हमारे पास ‘अग्नि‑नियंत्रण के लिए 11‑दिन का कोर्स’ नहीं है, बस दो‑दिन के प्रशिक्षण हैं।”

जापान की सरकार ने आपदा के बाद तेज़ी से आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया – पर्यटन, फ़ार्मा और लकड़ी‑उद्योग पर लगभग 300 करोड़ येन का प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में, जापान‑भारत संबंधों की परिप्रेक्ष्य में यह घटना कई सवाल अवश्य उठाएगी। भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या पिछले वर्ष 5% बढ़ी थी, और कई भारतीय कंपनियों ने जापान में वन‑उत्पादों के निर्यात की योजना बनाई थी। अब इन व्यापारियों को वैकल्पिक मार्ग और बीमा कवरेज की पुनः समीक्षा करनी पड़ेगी, जबकि केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की जलवायु नीति टीम को इस घटना को “जापान में जलवायु परिवर्तन के लक्षणों का नया संकेत” मानकर भारत के खुदरा जलवायु रणनीति में शामिल करना होगा।

आंतरिक आलोचना की बात करें तो, इस आपदा ने जापान के वन‑प्रबंधन विभाग की लापरवाहियों को उजागर किया। कई विशेषज्ञों ने कहा कि “रोकथाम के बजाए प्रतिक्रिया पर अधिक खर्च, जैसा कि इस मामले में स्पष्ट है, दीर्घकालिक समाधान नहीं है।” वन‑प्रबंधन के पुराने नियम, जैसे “वाइल्डफ़ायर‑फ्री ज़ोन” की असधाराणता, अब एक बौद्धिक विफलता के रूप में देखी जा रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने इस घटना को “जैवविविधता को बचाने के लिए एक मौसमी परीक्षण” कह कर सैलरी के बजट में कटौती को नहीं बदला।

वैश्विक स्तर पर, इस घटना को जलवायु‑संकट से जुड़े मंचों में अक्सर उद्धृत किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिषद के आगामी सत्र में, जापान ने इस आपदा को “साक्ष्य” के रूप में प्रस्तुत करने का वादा किया है, जिससे विकसित देशों पर अधिक कड़ी उत्सर्जन‑कमिटमेंट्स की माँग की जाएगी। इसके विपरीत, कुछ विकासशील देशों ने इस तरह के “नए ‘आकस्मिक’ नियामक” को प्रतिपादित किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय वार्तालाप में फिर से “दायित्व‑समानता” का प्रश्न उठेगा।

सारांशतः, यह जंगलगी न केवल जापान के पर्यावरणीय जोखिम को उजागर करती है, बल्कि वैश्विक जलवायु राजनीति में मौजूदा अंतरालों को भी रेखांकित करती है। भारत के लिए यह एक चेतावनी है: जब एक द्विपक्षीय सहयोगी संकट में फँसे, तो न केवल बचाव के उपकरण बल्कि नीति‑समन्वय और आर्थिक लचीलापन भी जांचा जाना चाहिए।

Published: May 4, 2026