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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जनरलों पर भरोसा खत्म, मिलिट्री में भरोसेमंदता का संकट
पिछले तेरह वर्षों में शी जिनपिंग ने चीन की जनरल स्टाफ़ को एशिया‑पैसिफिक में अमेरिकी सेना के बराबर बनाने का मिशन दिया। वार्षिक रक्षा बजट को दो‑तीन गुना बढ़ाते हुए, नयी शस्त्र प्रणाली, सैटेलाइट‑नेटवर्केड कम्यूनिकेशन और एआई‑संचालित कमांड‑एंड‑कंट्रोल तंत्र स्थापित किए गए। पर ऐसा नज़रिया नहीं रहा कि सेना के भीतर भरोसे की कमी ने एक अनपेक्षित शत्रुता को बुला दिया – स्वयं शी खुद उस भरोसे को कम करने में सफल हुए।
शुरुआत में शी ने अपने भरोसेमंद राजनैतिक सहयोगियों को उच्च सैन्य पदों पर नियुक्त किया, ताकि पार्टी‑नीति के साथ मिलिट्री की दिशा बेसलाइन पर रहे। लेकिन शी की “एकीकृत कमांड” सुधार ने कई मौजूदा दिग्गज जनरलों की शक्ति को कम कर दिया। नई संयुक्त लड़ाकू कमांड प्रणाली ने पारम्परिक “फी-फ़ोर” (स्थल, समुद्र, वायु, साइबर) को हटाकर, एक ही वरिष्ठ अधिकारी के हाथ में अधिकार केन्द्रित कर दिया – और इसका असर इस बात में दिखा कि अब वरिष्ठ जनरलों को अपने हाथ में शत्रु नहीं, बल्कि नियंत्रक का डर रह गया।
साथ ही, भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों ने कई उच्च‑रैंकिंग अधिकारी, जिनमें वायुसेना के पूर्व प्रमुख लियू ज़ेंगह्यू और थरती सेना के कमांडर काओ यून्ऊ शामिल थे, को “समर्थक शक्ति” के रूप में नहीं बल्कि “जोखिम कारक” के रूप में दिखा दिया। उनके पदहटाने की प्रक्रिया अक्सर सार्वजनिक अनुशासनात्मक बयानों में लिपट कर, एक सेंसर्ड शरारत की तरह प्रस्तुत हुई – जैसे “आगे के संघर्ष में भरोसे की कमी” का मेलोड्राम।
यह भरोसे की गिरावट केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रही। दक्षिण चीन सागर में तेज़ी से बढ़ते सैन्य अभ्यास, ताइवान को लेकर आक्रामक रुख और भारत‑चीन सीमा पर सतत तनाव, सभी इस बात का संकेत देते हैं कि शी की अब नेतृत्व शैली “प्रेरक सलाहकार” से “साक्षर निगरानीकर्ता” की ओर बदल गई है। भारतीय रणनीतिज्ञों ने पहले ही कहा है कि चीन की इस प्रकार की “केंद्रीकृत अति‑नियंत्रण” मॉडल, अगर सुदूर-पूर्व में कोई गलत कदम उठता है तो लचीलेपन की कमी के कारण बड़ा उलटाव ला सकता है।
वैश्विक संदर्भ में, अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस बदलाव को “चीन की सैन्य एकजुटता में संभावित पतन” के रूप में वर्णित किया है, जबकि यूरोपीय गठबंधन के विश्लेषक इसे “संभवित नेतृत्व टकराव” के संकेत के रूप में देख रहे हैं। सतही तौर पर चीन की सैन्य शक्ति में कोई गिरावट नहीं दिखती, पर शासकीय भरोसे की पतली परतों में दरारें कई रणनीतिक जोखिमों की छाया डाल रही हैं।
अंततः शी जिनपिंग की अपनी पीढ़ी को “विश्व शक्ति” के रूप में स्थापित करने की टालमटोल, अब एक दोधारी तलवार बन गई है। जबकि चीन की सैन्य आँकड़े चमकते रहे, वास्तविक प्रभावशीलता और जनरलों के भीतर भरोसे का अभाव, नीति‑निर्माता और अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षक दोनों के लिये एक मौलिक प्रश्न उठाता है: क्या एक अत्यधिक केंद्रीकृत कमाण्ड संरचना, विदेशी चुनौती‑प्रतिक्रिया में निहित लचीलापन को खाता है? भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रश्न का उत्तर, आगे के शैडो‑वॉर में, सीमापार तनाव को नियंत्रित करने के लिए सिक्के के दो पहलुओं की तरह रहेगा।
Published: May 9, 2026