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Category: दुनिया

चीन ने कहा: यू.एन. के अगले महासचिव में महिला देखना ‘बहुत खुशी’ की बात होगी

संयुक्त राष्ट्र के 80 साल के इतिहास में पहली बार महिला को महासचिव के पद पर देखना, बीते दो दशकों की रेटोरिक को आखिरकार एक वास्तविक दिशा‑संकेत बनाता दिखता है। इस सप्ताह, पेरिस में गुटेर्रेस के दूसरे कार्यकाल के समाप्ति की तत्परता के बीच, बीजिंग ने स्पष्ट रूप से कहा कि "एक महिला अगले यू.एन. महासचिव के रूप में चुनी जाए तो हमें बहुत खुशी होगी।" यह कथन, जो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से प्रसारित हुआ, कूटनीतिक स्वर में काफी सुस्पष्ट है, पर इसके पीछे की नीति‑दृष्टि का विश्लेषण करना उतना ही जरूरी है जितना कि अंगीभूत जेंडर‑इक्वैलिटी की सार्वजनिक मांग।

पहले तो यह समझना चाहिए कि चीन का यह बयान सिर्फ एक सतही समर्थन नहीं है। बीजिंग ने हाल के वर्षों में अपने राष्ट्रीय ब्रांड को "जेंडर‑प्रोग्रेसिव" के रूप में पुनःनिर्माण करने की कोशिश की है—जैसे 2024 में शंघाई में आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिलाओं के अधिकारों पर शिखर सम्मेलन, जहाँ कई विकसित राष्ट्रों ने चीन को सहयोगी के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन वास्तविकता में, चीन में शीर्ष राजनयिक और सुरक्षा पदों पर महिलाओं की भागीदारी अभी भी न्यूनतम है; विदेशी मामलों के मुख्य सचिव पद को 2021 तक सिर्फ दो महिलाओं ने संभाला। इसलिए, "बहुत खुशी" का यह बयान, एक पक्षी को धुंधले बत्तीस में भागने के बाद उसे मुक्त देखना जैसा प्रतीत होता है—बयान तो बड़ा दानव बन जाता है, पर वास्तविक भाग्य अभी तक तय नहीं हुआ।

इसी बीच, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट जज्बा नहीं दिखाया, परन्तु इशारे में वह अपनी मौजूदा नीति‑रुचियों को उजागर कर रहा है। भारत ने महिलाओं के नेतृत्व को "समानता का प्रतीक" मानते हुए, 2025 में अपनी पहली महिला प्रधान सचिव (पब्लिक सर्विस) को नियुक्त करने के बाद, संयुक्त राष्ट्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिये एक द्विपक्षीय संवाद शुरू किया है। भारत की यह हल्की‑फुल्की सहमति, चीन के अलंकारिक बयान से बारीकी से अलग है—यह वास्तविक नीति‑परिवर्तन की दिशा में एक छोटी‑सी छलांग लगाती है, बजाय सिर्फ मंचीय बयान के।

भारी शक्ति‑संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह कहना व्यंग्यात्मक नहीं होगा कि यू.एन. के अगले महासचिव की नियुक्ति, जेंडर‑इक्वैलिटी के शब्दावली को कबूतर की तरह मीठा कर देती है जबकि गुप्त शक्ति‑संतुलन की सुईयां अभी भी जगह-जगह लटकी हुई हैं। चीन का "बहुत खुशी" कहना, असल में यह संकेत देता है कि वह पश्चिमी देशों के साथ गठबंधन को नयी रूप‑रेखा देना चाहता है, विशेषकर अमेरिका‑यूरोप के बीच बढ़ती विभाजन की स्थिति में। जबकि चीन ने पिछले वर्षों में "लिंग समानता" को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोहरी नीति के रूप में इस्तेमाल किया है, यू.एन. के शीर्ष पद पर महिला होने की संभावना, उनके लिये एक कूटनीतिक टोकन बनकर रह सकती है, अगर आवेदन प्रक्रिया के बाद वास्तविक शक्ति‑विन्यास में बदलाव नहीं आता।

संक्षेप में, चीन का बयान, भले ही खीताब में सच्ची सराहना दिखाता हो, लेकिन उस सराहना की वास्तविक गहराई अभी भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर शक्ति‑डायनामिक में जमे हुए पुराने बूटों से बँधी हुई प्रतीत होती है। भारत, इस उलझन में, अपनी मौसमी नीति‑परिवर्तनों और जेंडर‑इक्वैलिटी के समर्थन को स्थिरता की कसौटी पर रख रहा है। आगे देखना यह होगा कि चाहे महिला उम्मीदवार को चुनना एक वास्तविक प्रतिबद्धता बन जाए या फिर केवल "बहु‑बहु खुशी" की मौखिक अभिव्यक्ति के रूप में ही रह जाए।

Published: May 6, 2026